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नेट से कमाई परफेक्ट

May 18,2015 01-23-2018 09:34pm

नैन्सी पंवारःहर माह 100 अरब रुपए का है खेला। दिन में ही जुगनुओं को पकड़ने की जिद करें, बच्चे हमारे दौर के बहुत चालाक हो गए। 0- यूथ को घर में एक दिन रोटी ना मिले तो अक्ल ठिकाने आ जाती है, हां अगर उसे इंटरनेट दे दें तो वो सात दिन तक शक्ल नहीं दिखाएगा। ये है इंटरनेट की लत। आज की सारी पीढ़ी नेट के वेट के नीचे जिंदगी के रेट ही बिसरा चुकी है। लगातार सामने आ रही पड़ताल खतरनाक है। नेट और प्रेमिका में से एक को चुनना पड़े तो आज की पीढ़ी नेट के रेट ही ज्यादा लगा रही है। यानि प्यार पर इंटरनेट के वार। इस तस्वीर का दूसरा और ज्यादा खतरनाक पहलू ये है कि सारी युवा पीढ़ी को ऐसी लत लगाकर टेलीकाम कंपनियां केवल हिंदुस्तान से ही हर माह अरबों रुपए कमा रही हैं। बाजार के मुताबिक औसतन इंडिया में हर माह 100 अरब रुपए से ज्यादा नेट पर लुटाए जा रहे हैं। यानी ज्ञान व सुविधा की कम कीमत नहीं चुका रहे हैं हम। बाकी दुनिया की तो बात ही अलग है। नोट दो-नेट लो-देखो और हमारा खजाना पाटो। यही थ्योरी है टेलीकाम कंपनियों की।

इसमें संदेह नहीं कि नेट की सुविधा से काम आसान हुआ है। खत और कोरियर में बर्बाद होने वाला समय बच रहा है। बिजनेस, नौकरी और स्कूल-कालेज से लेकर हर कंपनी संगठन,दफ्तर, बैंक व सरकारी सिस्टम या कहा जाए देश के किसी भी हिस्से का नेट के बिना काम चलना मुश्किल ही नहीं अब नामुमकिन सा लगने लगा है। ऐसा है भी । नेट गोल तो समझ लीजिए कितना नुकसान । पर ये तो हुई काम के सिलसिले की बात पर दफ्तरों और बिजनेस घरानों में वो काम करता है इस वजह से उसके नुकसान नजर नहीं आते पर वो युवा पीढ़ी या कहा जाए जिसकी मूंछ तक ढंग से उगी नहीं वो नेट का दीवाना हुआ घूम रहा है। ये स्थिति फिलहाल चाहे चिंताजनक ना लग रही हो पर इस देश की युवा पीढ़ी को आबाद कम और बर्बाद ज्यादा कर रही है। सबसे बड़ा नशा। हाल ही में हुए एक सरवे में हिंदुस्तान ने सबको पीछे छोड़ दिया है। घूमना-फिरना, डेटिंग, म्यूजिक, फिल्म जो 21 वीं सदी आने तक युवाओं के वास्ते सबसे ऊपर होते थे अब सब नेट के नीचे हैं।95 फीसदी हिंदुस्तानी युवा नेट को तरजीह दे रहे हैं। इन युवाओं का कहना है कि वे इंटरनेट के बिना रह ही नहीं सकते हैं , यह उनकी जिंदगी का एक हिस्सा बन गया है।तब तक तो ठीक था जब तक दोस्तों में शेखी बघारने के वास्ते युवाओं के हाथों में कार होती थी पर अब तो इस पीढ़ी को नेट के सिवा किसी और से मतलब ही नहीं रह गया है।

ज्ञान के नाम पर हर समय लेपटाप, डेस्कटाप से चिपकी ये कौम जिंदगी की बाकी अहम चीजों को होम करती जा रही है। कौन आ रहा है कौन जा रहा है, आसपास क्या हो रहा है इससे कोई मतलब नहीं? हां नेट पर क्या हो रहा है, कौन दोस्त आन लाइन है यह जरूरी है। अगर आप नेट पर नहीं हैं तो आप गंवार हैं। ये धारणा युवकों के मन में जिस देश में आ जाए तो क्या कहा जा सकता है? सर्वे के मुताबिक कार चाहिए या इंटरनेट से एक्सेस , तो 64 फीसदी ने कार की जगह नेट को चुना , हिंदुस्तान में तो 77 फीसदी युवा कार को बेकार ही मान बैठे। सर्वे कराने वाली कंपनी कहती है कि जिस तरह युवा पीढ़ी आनलाइन है उससे जेनरेशन गैप 20 से घटकर 5 साल रह गया है। पर सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि क्या ऐसा है? समाजशास्त्री कहते हैं कि नेट की दुनिया ने इंसान की दुनिया को ही उजाड़ दिया है। गैप अब जेनरेशन में नहीं बल्कि परिवारों में ज्यादा आ गए हैं। मिलने से प्रेम बढ़ता था पर अब मिलना है तो नेट पर मिलो। सोशल मीडिया पर मिलो। इससे बाप को बेटे के और बेटे को बाप के घर में ही दर्शन कई दिनों तक आसानी से नहीं होते। बाप समझता है बेटा काम कर रहा है। बेटा है कि वो दोस्तों के साथ चैटिंग में व्यस्त है। मस्त है।नेट सुविधा देने वाली कंपनियों ने युवा पीढ़ी को ऐसी लत लगा दी है कि उसे इसके अलावा और किसी काम की ना तो होश और ना ही उनमें जोश। इस लत से माल कमाने में कंपनियां रत हैं।

टेलीकाम सेक्टर की जानकारी के मुताबिक हिंदुस्तान में हर माह 100 अरब रुपए से ज्यादा के नोट नेट का रेट पी जाता है। यानि हर दिन तकरीबन 3 अरब रुपए। देश में 90 करोड़ से ज्यादा मोबाइल यूजर हैं। तकरीबन 70 करोड़ नेट का यूज करते हैं। रोजाना औसतन 5 रुपए भी नेट पर खर्च करें तो ये आंकड़ा कहां पहुंचता है अंदाजा लगाया जा सकता है? क्या इसके बाद भी कहा जा सकता है कि ये देश गरीब है? हकीकत यही है कि दौलत की चाह में एक प्लान के तहत हिंदुस्तान की जनता को भी इस राह पर डाल दिया गया है। ज्ञान के लिए नेट हो पर ऐसी भी क्या बात की बाकी कुछ हो ना हो पर नेट हो। हर समय नेट पर लगे हुई कौम को प्यार करने की फुर्सत ही कहां है? है तो नेट पर । अगर प्यार करना है तो नेट पर आओ-जाओ। सड़कों पर धक्के खाने की क्या जरूरत है? यही युवा पीढ़ी का फलसफा बन गया है।

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