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COMMENTARY
 

लोक की कमाई खूब उड़ाई

May 18,2015 04-23-2018 10:50pm

देशपालसिंह पंवारःचुनाव दे रहे देश को घाव। 0-देश में हर कोई मानता है कि करप्शन की असली जड़ है राजनीति और राजनेता। सही नेता संसद व विधानसभा पहुंचे और देश-राज्य को सही ढंग से चलाएं । ये कहना जितना आसान दिखता है ऐसा होना उतना ही मुश्किल। अरसे से राजनीति के अपराधीकरण और अपराधियों की राजनीति ने इस सही के मायने ही बदल डाले। वो जो सोचें वो सही, वो जो कहें वो और सही, वो जो करें वो सबसे सही। उनकी ही कही हर बात सही की थीम पर अब तक ये देश चलता आया है। अब एक आस बंधी है शायद चुनाव सुधार के नाम पर कुछ हो। हुआ तो बहुत है पर उसके नतीजे सबके सामने हैं। हकीकत ये है कि चुनाव की धारा में लोक की कमाई तंत्र ने इस तरह बहाई कि आज सारा देश ही उसमें बहता और डूबता नजर आ रहा है। दुख इस बात का नहीं कि चुनाव क्यों होतें हैं और उन पर इतना खर्च क्यों होता है? दर्द इस बात का है कि करप्ट नेताओं को माननीय बनाने के वास्ते खजाना क्यों लुटता आया है? इस देश में सब तरह के चुनाव पर आज तक जितना खर्च हुआ है उससे एक नया हिंदुस्तान बनाया जा सकता था पर इतना लुटाने के बाद यहां तो पुराना हिंदुस्तान ही आज लुटा-पिटा नजर आता है। लोक के साथ तंत्र का इससे बड़ा छल और क्या हो सकता है?हर साल किसी ना किसी राज्य में चुनाव होते हैं।गरीब जन के तन-मन से कमाया धन इन गणमान्य को चुनने के नाम पर जाया होता है। ई वोटिंग जैसी तकनीक को अगर समय रहते नहीं अपनाया गया तो यकीनन लुट रहा धन एक दिन देश को ले डूबेगा।

0-ये और ज्यादा हैरत की बात है कि आज तक किसी ने ये जहमत नहीं उठाई कि आखिर लोकतंत्र में ऐसे नेताओं को चुनने की इस देश और इस देश की जनता ने क्या कीमत (पैसा) चुकाई? हम गांव-शहर-निकाय-निगम-स्कूल-कालेज-सोसायटी या फिर किसी युनियन चुनाव की बात नहीं कर रहे पर क्या इस देश में ऐसा कोई है जो ये बता सकता है कि आजादी के बाद अब तक संसदीय चुनावों में गण के नाम पर जन का कितना धन खर्च हुआ है? राज्यों में विधायकों को चुनने पर खजाने से कितना गया? इस देश में है कोई ऐसा बंदा जो इसका जवाब बिना हिसाब लगाए एक ही सांस में दे पाए? कन्याकुमारी से लेकर कश्मीर तक ढूंढते रह जाओगे पर नहीं मिलेगा। नेता तो छोड़िए वे तक नहीं दे पाएंगे जो अरसे से चुनाव कराते आ रहे हैं। अगर आपके पास 2-4 दिन की फुरसत है, दिल मजबूत है तो जोड़-घटा की मशीन साथ में रखिए और खपाइए दिमाग,जो सरकारी आंकड़ा सामने आएगा वही आपके होश ठिकाने लगाने के लिए काफी होगा। हां यह तय है कि गैर सरकारी यानि दलों, प्रत्याशियों और उनके समथर्कों के खर्च का सही बिल आपके दिल को ले डूबेगा। नहीं यकीन है तो कोशिश करने में क्या हर्ज है? ये जानना तो हमारा फर्ज है। इस मिट्टी का हम पर कर्ज है। लोकतंत्र के फायदे के कायदे तो हमें पढ़ाए जाते हैं पर लोकतंत्र में ऐसे-वैसे नेताओं के नाम पर क्या गया इस पर कोई बात नहीं करता। लोकतंत्र का आज यही सबसे बड़ा मर्ज है -आए दिन चुनाव के कारण बढ़ता खरचा-लुटता खजाना। जनता को चाहे ना मिले खाना पर बजता रहेगा ये गाना। हम ये नहीं कहते कि चुनाव ना हों पर ई वोटिंग जैसा रास्ता समय रहते निकाला जा सकता था ताकि खजाना लुटने का ये फसाना ऐसा गमगीन ना होता। आमजन ना रोता। विश्वास ना खोता। चैन से सोता। सच यही है कि आज तक जितना धन देश में चुनावों पर बहाया गया है उससे हर जन के सपनों को पूरा करने वाला गौरवशाली देश बनाया जा सकता था। इस देश को फिर सोने की चिड़िया में बदला जा सकता था। हर हाथ को काम-हर पेट को रोटी-हर सिर को छत, हर बच्चे को शिक्षा, हर बीमार को दवा और हर गरीब को अमीर बनाया जा सकता था। पर हकीकत यही है कि जब इस बारे में सोचने वाले थे, इस मर्ज के डाक्टर थे तब ये मर्ज नहीं था और जब ये फैलने लगा तो सब नेता धृतराष्ट्र की तरह आंख पर पट्टी बांधे या तो हस्तिनापुर को लुटते देखते रहे या लूटते रहे। उन्हें दर्द तक नहीं हुआ। होता कैसे? खुद की जेब से कुछ नहीं लगना था, जनता को ठगना था,उसका पेट कटना था, उसे ही मरना था, हर बार ऐसों-वैसों को चुनने के वास्ते खजाना भरना था।

सब जानते हैं कि जितना सरकारी धन चुनाव पर खर्च होता है उससे पचास गुना ज्यादा गैर सरकारी खर्च होता है। प्रत्याशियों और दलों के लिए जो निर्धारित खर्च होता है , उसमें चुनाव नहीं लड़ा जाता।अब कोई नहीं लड़ता। जिसकी जैसी हैसियत वो उसी हिसाब से धंधेबाजों से वसूलता है, खर्च करता है और जीतने पर उसकी उगाई के लिए उल्टे-पुल्टे धंधे करता और कराता है। चुनाव की इस गंगोत्री को इस कदर मैला कर दिया गया है कि आज बिन माया चुनाव लड़ना तो दूर उसके बारे में सोचना तक दुश्वार है। यही लोकतंत्र पर सबसे गहरा वार है। वैचारिक विरोध का मुलम्मा लगाने वाले गद्दी के स्वार्थी नेताओं की वजह से जिस तरह संसद व राज्यों की एसेंबलियों की असमय मौत होने लगी हैं उसने हालात बद से और बदतर कर दिए हैं।

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 1952 में देश में पहला संसदीय चुनाव 10 करोड़ 45 लाख में हो गया था। इसके बाद 57 में 5 करोड़,90 लाख, 62 में 7 करोड़, 32 लाख, 67 में 10 करोड़, 79 लाख, 71 में 11 करोड़,60 लाख, 77 में 23 करोड़, 80 में 54 करोड़, 77 लाख, 84 में 81 करोड़, 51 लाख खजाने से चुनाव पर बहे। यह रकम कुल मिलाकर जितनी बैठती है उससे ज्यादा अकेले 91 के चुनाव में खर्च हो गए। यानि 8 चुनाव के बराबर एक पर। इसके बाद तो खुदा ही मालिक है। ये खर्च सूदखोर बनिया के ब्याज की तरह बढ़ता गया। 89 में 154 करोड़, 96 में 597 करोड़,98 में 666 करोड़, 99 में 880 करोड़ और 2004 में यह 1300 करोड़ तक पहुंच गया। इसमें लाखों तथा हजारों की गिनती का कोई हिसाब-किताब नहीं है। 2009 में तो ये सारे ही रिकार्ड़ तोड़ गया। 52 से 2004 तक जितना खर्च हुआ उससे कहीं ज्यादा दस हजार करोड़ की रकम तक कम पड़ गई ।2014 में 15-20 हजार करोड़ के आसपास लगा। ये वो धन है जो आयोग खर्च करता है। चुनाव पर सरकारें खर्च करती हैं। प्रत्याशियों का खर्च इससे अलहदा है। तमाम राज्यों में एसेंबलियों के चुनाव पर खर्च होने वाली माया इससे अलग है। समय से पहले चुनाव ने ज्यादा दांव दिए। 1971 में पहली बार संसदीय चुनाव समय से पहले हुए। फिर 77 और 80 की पारी पूरी नहीं हुई। 89 में लोस दो साल चली पर सारे रिकार्ड़ टूटे 96 से। चार साल में तीन चुनाव। देश और देश की जनता की सेहत के साथ इस खिलवाड़ के लिए आखिर कौन जवाब देगा? बीजेपी नेता एल के आडवाणी ने अगर संसद और एसेंबलियों का कायर्काल पूरे पांच साल चलने की बात कही थी तो वो गलत नहीं था। अगर वो यह कहते रहे हैं कि दोनों चुनाव साथ होने चाहिए तो यह और बेहतर सुझाव था। इससे ना केवल स्वार्थी नेताओं की कुटिल चाल से देश हलाल होने से बचेगा बल्कि बचे हुए धन से विकास के काम हो पाएंगे। देश बचाने के वास्ते अब समय आ गया है कि सारी चुनावी प्रक्रिया में आमूल-चूल परिवर्तन हो ताकि 10-20 हजार जेब में रखने वाला तक चुनाव मैदान में उतर सके। वरना फिलहाल तो चुनाव सिर्फ पैसे वालों का खेला रह गया है। क्या लोकतंत्र की यही मंशा थी? क्या जनता की यही मंशा थी? क्या संविधान की यही मूल इच्छा थी? अगर नहीं तो फिर करप्ट नेताओं पर सरकारी खजाने से जनता की कमाई क्यों लुटे? अगर खर्च हो तो फिर अच्छे नेता सर्च होकर सामने आएं ताकि ये करप्शन और काली कमाई जैसे गीत अब और ना गाएं जाएं। सरकार-संसद और संविधान के खिलाफ नारे लगाने व अनशन करने की नौबत ना आए।

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