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नरक मत बनाओ

May 17,2015 06-20-2018 02:09am

 नरक मत बनाओ

नैन्सी पंवार

0 किसी से कह कर तो देखो-सुधर जाओ। दबंग हुआ तो आपको सुधार देगा। दो-चार हड्डी पर जलजला आ जाएगा। ज्यादा शरीफ हुआ तो कमी पूछेगा। हां बहस घंटों करेगा। कुछ ऐेसे भी मिलेंगे जो इस सलाह पर आपकी ओर इस अंदाज में देखेंगे जैसे कोई पागल हो, कोई कहेगा -तुमने ठेका ले रखा है?, जाओ अपना काम करो। रास्ता नापो। हर कोई रास्ता नाप रहा है- रास्ते के हिसाब से पर अकड़ देखिए-दिखा यही रहा है कि रास्ता भी उसकी मर्जी का है। खैर खुदा करे-हर रास्ता - हर इंसान की मर्जी का हो। पर कम से कम इस शहर में ना तो कोई रास्ता आपकी मर्जी सरीखा है। ना ही शहर की दीवारों पर रंगी-पुती इबारतें आपकी मर्जी की हैं। वो उनकी पसंदीदा हैं जो अपनी मर्जी के मालिक हैं। लोकतंत्र की पैदाइश हैं। कोई रोकने-बोलने-टोकने या डपटने वाला तो है नहीं। लिहाजा पूरा ये शहर या कहा जाए पूरा देश रंगा-पुता नजर आता है। कहां-कौन -क्या चिपकाकर चला जाता है, ये घर के मालिक तक को पता नहीं चलता। इनकी छोड़िए -राष्ट्रपिता तक पूछते रह जाते हैं कि भाई मेरा क्या कसूर है, जो मरने के बाद भी चैन से खड़े नहीं रहने देते। अहिंसा के पुजारी की मूर्ति पर हिंसक नारे। भांति-भांति के लोग, भांति-भांति के संगठन और भांति-भांति के नारे। वाह प्यारे। हर शहर बेढंगा नजर आता है।

गंद फैलाने वाले 5 फीसदी-भुगतने वाले 50 लाख। एक बात इनके दिमाग में क्यों नहीं घुसती कि दीवारों पर नारे या प्रचार का दौर कब का खत्म हो गया। तब कोई चारा नहीं था। अब दीवारों पर लिखी इबारतें कोई निठल्ला ही पढ़ता होगा। चलो इन्हें मुगालता है तो मुगालते में जीने दो पर नगर निगम वालों इनसे कुछ तो वसूलो ताकि ये शहर थोड़ा तो साफ-सुथरा हो। कुछ तो नियम बनाओ। बनाओगे -यकीन नहीं। जहां खुद कोई नियम नहीं -वो क्या नियम बनाएगा। सब वक्त पर छोड़ दो। वक्त सबको सुधार देता है। एक दिन ये भी सुधरेगा। पर कीमत वसूलने के बाद।

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