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COMMENTARY
 

चुगलखोरी

May 17,2015 01-23-2018 09:31pm

मिथलेश

चुगलखोरी का चौतरफा खूब बोलबाला। 0सच तो एक परिंदा है,घायल है पर जिंदा है।देश में सवा अरब से ज्यादा जुबान हैं। बच्चों-बूढ़ों की 40 करोड़ और अपवाद स्वरूप 5 करोड़ मजलूम और ताकतवर जुबानों को अगर छोड़ दिया तो बाकी सब जुबान कैंची की तरह चलती है। कोई टैक्स तो लगता नहीं। हां एनर्जी लगती है पर घर की खेती है। फिर मिल जाएगी। बोलने,कोसने, टोकने, लड़ने, चुगली करने में हर समय तमाम चेहरे लीन। लिहाजा मेरठ हो या कोई और शहर या कोई गांव-हर जगह बोल के कड़वे गोल दागे जा रहे हैं। तोल-मोल के बोल गुल और जहरीले बोल फुल। जिसे जानते तक नहीं। जिसे देखा तक नहीं। उसके बारे में भी ऐसे प्रवचन हर गली-हर नुक्कड़ या निठल्लों की सभा में सुनने को मिल जाएंगे कि आपकी भी किसी शरीफ के बारे में अच्छी धारणा की डोली डगमगाती नजर आएगी। ऐसे लच्छेदार बोल उगलेंगे कि सच थोड़ी देर में ढेर नजर आएगा।

वैसे भी कहा जाता है कि चुगलखोर और जन्मजात आलोचक इस धरती की सबसे बड़ी ताकतवर बिरादरी है। नौ नकटे- नाक वाले दसवें की नाक काटने पर तुले रहते हैं। हर तरह के प्रदूषण पर हम चिल्लाते हैं। फिक्रमंद नजर आते हैं। बोलते हैं पर क्या कभी हमनें ये सोचा है कि कड़वे और घटिया बोल का प्रदूषण इस देश में कितना जहर फैला रहा है? क्या कुछ हमसे छीन ले जा रहा है? जिसकी हैसियत नहीं-वो हैसियत वालों की पतलून खींच रहा है। ना कद का एहसास-ना पद का। बस जुबान से भद्द पीटनी है। इसमें भारतीयों का कोई जोड़ ना तो था। ना है। ना होगा। कैकई के कोपभवन में ऐसे-ऐसे। बाप रे बाप। अगर सारी बेलगाम जुबानों का ये जहर एक साथ देश की जनता पर लाइव के जरिए उड़ेला जाए तो.. सह पाओगे?

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