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वादी आबादी की

May 17,2017 12-17-2017 09:21pm

 
वादी आबादी की
देशपाल सिंह पंवार 
कोई रहने की जगह है मेरे सपनों के लिए,
वो घरौंदा ही सही, मिट्टी का भी घर होता है। (दुष्यंत कुमार)
जिस देश की 35 करोड़ जनता महागरीब हो,वो देश हर मिनट 51 बच्चे पैदा करके खुशियां मनाता है। जिस देश में 45 करोड़ गरीब हों, वो देश हर घंटे 4000 बच्चे पैदा करता है। जिस देश की 48 करोड़ आबादी को घर नसीब ना हो वो देश हर दिन 95 हजार बच्चे पैदा करके गर्व महसूस करता है। जिस देश में पहले से ही 39 करोड़ से ज्यादा अनपढ़ हों वो देश हर महीने 28 लाख से ज्यादा बच्चे पैदा करके इस आंकड़े पर इतराता नजर आता है। जिस देश की 50 करोड़ युवाओं की फौज पहले ही बेरोजगारी में तलुवे घिस रही है वो देश हर साल तीन करोड़ से ज्यादा भlवी भविष्य पैदा कर रहा है। जिस देश की आबादी पहले ही 1.30 अरब से ज्यादा हो गई हो वो देश हर साल एक आस्ट्रेलिया पैदा करके दुनिया पर तिरंगा लहराना चाहता है। जिस देश का 200 हजार करोड़ से ज्यादा परिवार नियोजन चाट चुका है वो देश 2060 तक चीन को पीछे छोड़ने में जुटा है। जिस देश में कोई भी ऐसा ना हो जो बीमार ना हो वो देश आबादी के बल पर अगले 50  साल में ना जाने कौन सा इतिहास रचना चाहता है? चाहे उस वक्त तक इस देश की गांठ में दो टका धन ना बचे, जन को खाने को दो रोटी नसीब ना हो, तन ढांपने को दो गज कपड़ा ना मिले, सर छिपाने को दो हाथ छत ना मिले, पैर रखने को दो कदम जमीन ना मिले,सांस लेने को साफ हवा ना मिले, बीमारी के वास्ते दवा ना मिले पर हम आबादी बढ़ाने से पीछे हटने वाले नहीं। हम आजादी की सालगिरह मना रहे हैं। चारों तरफ यही माहौल है। होना भी चाहिए,तरक्की भी की है लेकिन इस वादी की आजादी के सारे मायने आबादी के सामने बदलते नजर आते हैं। कड़वा सच यही है कि हर बरबादी की जड़ यही बेलगाम बढ़ती आबादी है इसके बावजूद हम बच्चों को ऊपरवाले की नेमत मानकर पैदा करते जाएंगे। संसाधनों की कमी झेलते जाएंगे। खाली पेट मरते जाएंगे। गरीबी का रोना रोते जाएंगे। ना तो हम मानेंगे और ना ही वो ठानेगे जिनके वास्ते वोटों की ये फसल लहलहाती जा रही है। खाद्य संकट सिर पर मंडरा चुका है। महंगाई चरम पर है। जिंदगी चलाने के वास्ते सारी चीजों के रास्ते संकरे होते जा रहे हैं पर इस देश में आबादी राष्ट्रीय मुद्दा नहीं। प्रमुख मुद्दा नहीं। आखिर कब वो दिन आएगा जब इस देश की जनता चेतेगी, सरकार जागेगी? क्या अपनी करनी से मौत का मंडराता साया नजर नहीं आ रहा है? क्या जनसंख्या का ज्वालामुखी सुलगता नजर नहीं आ रहा है? आने वाले बरसों में बस इसमें विस्फोट होना है और उसके बाद क्या बचेगा, क्या नहीं, कौन जानता है? इतनी जनता को सरकार अगर दो वक्त की रोटी मुहैय्या नहीं करा पाएगी तो फिर इससे पैदा होने वाली जंग क्या इस देश के अस्तित्व के लिए खतरा नहीं बनेगी?
ये कोई चौंकाने वाले आंकड़े नहीं है। दिल दहलाने वाला वो कड़वा सच है जो इस मुल्क की भयावह तस्वीर  बयां करता है। हमें बताता है कि इस दुनिया का हर छठा आदमी हिंदुस्तान में बसता है। हम आबादी में सारी दुनिया का 18 फीसदी हैं। पर हमारे पास दुनिया की जमीन का सिर्फ 2.5 फीसदी हिस्सा ही है। जिसे खींचकर फैलाया तो नहीं जा सकता हां उसका हर हिस्सा आबादी से ढांपने की जरूर हमने ठान ली है। शायद यही कारण है कि यहां जिंदगी सस्ती और मौत महंगी है। इस 18 फीसदी आबादी में से भी 35 फीसदी जनता 15 साल से कम उम्र की है जिसे हम लगातार बढ़ाते जा रहे हैं। ना तो ये कमा सकती और ना वो 14 फीसदी  जो 65 साल से ऊपर की है। यानि इस देश की तकरीबन 30 फीसदी वो आबादी हो गई जो सिर्फ दूसरों की कमाई ही खाती है। अपना बोझ उठाने की स्थिति में नहीं है पर हम सुधरते नजर नहीं आते।  हम इसी साल अमेरिका, आस्ट्रेलिया, रूस, न्यूजीलैंड, जापान और कनाडा तथा सारे यूरोपियन देशों की कुल जनसंख्या को पीछे छोड़ देंगे। क्या अब भी हमें इस बात का एहसास नहीं होता कि इन सारे देशों के अमीर होने का कारण क्या है? क्या इसके पीछे आबादी अहम कारण नहीं है? 2060 में हम आबादी में नंबर वन होंगे। हमारी आबादी होगी डेढ़ अरब। चीन की होगी एक अरब 49 करोड़। ये स्थिति तो तब है जबकि चीन हमसे 19 साल पहले एक अरब की संख्या को पार कर गया था।  सुधार होने के दावे किए जा रहे हैं पर अंतर केवल इतना आया है कि पहले चीन को पीछे छोड़ने का साल 2045 बताया जा रहा था। अब जिस गति से आबादी बढ़ रही है उससे इन पांच साल में ही हमारी आबादी 13 करोड़ और चीन की आबादी आठ करोड़ बढ़ने की बात की जा रही है। यानि चीन हमसे बेहतर कर रहा है, हां ये बात दीगर है कि वहां लिंगानुपात का संकट सामने है। खैर उसके नतीजे तो बाद में सामने आएंगे पर वहां सरकार ने वो हिम्मत दिखाई, जनता ने उस नीति पर चलने की चाहत दिखाई। हम तो कहीं रूकते नजर ही नहीं आते।  कड़वा सच यह भी है कि हिंदुस्तान व चीन के अलावा अगले सौ साल में दुनिया का कोई देश एक अरब के आंकड़े को नहीं छूने वाला। वैसे जो कारनामा सारी दुनिया मिलकर 452 साल में नहीं कर पाई वो हमने 52 साल में ही कर दिखाया था। 15 अगस्त 1947 को जब हम आजाद हुए थे तो हम थे मात्र 34.50 करोड़। ठीक 52 साल बाद 1999 में इसी दिन हम थे एक अरब। अब काफी अरसे से कहा जा रहा है कि हम हैं 1.30 अरब। अब ना जानें कितने होंगे ये तो बस अंदाजा ही लगाया जा सकता है। इसके ठीक उल्ट दुनिया की आबादी   1380 में थी 34 करोड़। 1804 में वो पहुंची एक अरब। 200 साल बाद वो पहुंची थी सात अरब। इस संख्या में तीन अरब का योगदान तो अकेले हिंदुस्तान व चीन का ही है।
अमीर देश आबादी बढ़ाएं तो समझ में आता है पर सबसे बड़ी त्रासदी तो यही है कि जो देश जितना गरीब वहां उतनी ही ज्यादा जनसंख्या की पैदावार। ये देश आबादी में अगर नंबर दो है तो करप्शन में नंबर तीन। सब कुछ हमने निजी क्षेत्र को बेच दिया है इसके बावजूद हम 70 लाख करोड़ से ज्यादा के कर्जदार हैं। इससे ज्यादा काली कमाई हमारी विदेशी बैंकों में जमा है पर उसे निकलवाने की हमारी ना तो हैसियत है और ना ही कोई चाह। देश के खजाने से एक बड़ा हिस्सा हम इस कर्जे का सूद चुकाने में खर्च करने को मजबूर हैं। पर आबादी है कि सूदखोर बनिया के ब्याज की तरह बढ़ती ही जा रही है। सब जानते हैं कि देश में गरीबी, बेरोजगारी, बीमारी, अपराध व करप्शन का असली कारण बढ़ती आबादी है। देश के किसी हिस्से में चले जाएं , सड़कों पर चलने की जगह नहीं है। दूर-दूर तक सिर ही सिर नजर आते हैं। मिनटों का रास्ता घंटों में तय होता है। अस्पतालों में जगह नहीं है। बीमारी की वजह से दवा कंपनियों की चांदी है। वैसे भी ये कड़वा सच है कि ज्यादा जनता होने की वजह से जब ढंग का खाना ही नहीं मिलेगा तो बीमारी तो जरूर घर करेगी। ऊपर से जंक फूड का कहर। इसी वजह से इस देश में जनसंख्या के बढ़ने का सबसे बड़ा फायदा सिर्फ डाक्टरों और दवा कंपनियों को ही है। अपराध बेलगाम हैं। जेलें तक फुल हैं। राकेट की गति से बढ़ रही आबादी की वजह से विकास के काम नहीं हो रहे हैं। बड़ी आबादी को शिक्षा नहीं मिल पा रही है। रोजगार के अवसर जितने पैदा होते हैं उससे हजार गुना ज्यादा बच्चे पैदा हो रहे हैं। विकास के काम नहीं हो रहे हैं। अगर किसी देश की बड़ी कमाई रोटी-कपड़ा और मकान पर ही चली जाएगी तो वो देश और वो कौम कैसे तरक्की कर सकती है? केरल जैसे जो 2-4 राज्य तरक्की कर रहे हैं तो वहां सख्ती से जनसंख्या नियंत्रण नीति लागू है इस वजह से वहां संसाधन जनसंख्या दबाव झेलने की स्थिति में हैं। दक्षिणी राज्यों के पथ पर ना चलने की वजह से ही बाकी राज्यों की ये गत हो रही है।
ये शब्द है बीमारू राज्य। ये ऐसे ही कहने को नहीं बना। बल्कि इसका मतलब है बिहार, मध्यप्रदेश, राजस्थान और उत्तरप्रदेश। कितनी बड़ी विडंबना है कि इस देश की राजनीति को अरसे तक हांकने वाले राजनेता इन्हीं राज्यों से आए पर वो अपने राज्यों को इस स्थिति में नहीं ला पाए कि वहां पर आबादी बरबादी का कारण नहीं बन पाती। ये चारों हिंदी वाले राज्यों ने काली स्याही से इस देश की ऐसी तस्वीर लिख डाली है कि अब सब कुछ तबाह नजर आने लगा है। इस देश की आधी आबादी को यही चार राज्य झेल रहे हैं। हर कोई जानता है कि इन राज्यों और यहां की जनता की वास्तविक स्थिति क्या है? इन्हीं राज्यों से संसद का कोटा सबसे ज्यादा है।  होना ठीक उल्टा चाहिए था। जहां आबादी पर कंट्रोल होता उन राज्यों को ज्यादा सीट मिलनी चाहिए थी पर इस देश में जहां आबादी ज्यादा वहां संसद की सीट ज्यादा। आखिर ये किस तरह की नीति है? मिलना चाहिए था दंड। दे रहे हैं ईनाम। नेताओं को आखिर इस बात का एहसास हो भी तो कैसे? उनके लिए तो आबादी राजनीति की ऐसी फसल है जिसके बढ़ने में ही फायदा है। तो फिर वो जनता व देश के बारे में क्यों सोचें? वोटों का मोह उन्हें कुछ करने नहीं देता और जनसंख्या के आधार पर संसद की सीटों के तय होने का कानून उन्हें कुछ सोचने नहीं देता। 1976-77 में संसद की सीटें बढ़ाने की योजना पर 2000 तक रोक लगा दी गई थी।इसके बाद फिर परिसीमन के तहत संसद की सीटें 2026 तक ना बढ़ाने का फैसला हुआ। नेता जानते हैं कि जब ये सीटें बढ़ेंगी तो जनसंख्या ही असली पैमाना होगी तो फिर वो क्यों घाटे का सौदा करें? वो मजे से इस लहलहाती फसल को खाद-पानी देकर सींचते जा रहे हैं।
यूपी को ही लीजिए यहां हर मिनट 11 बच्चे पैदा होते हैं। सात अरबवां बच्चा भी यहीं पर पैदा हुआ था। इस अकेले प्रदेश में इतनी जनता रहती है जितनी चीन, ब्राजील, अमेरिका व इंडोनेशिया को छोड़ बाकी किसी देश में नहीं रहती। बिहार भी ज्यादा पीछे नहीं है। आजादी के समय तीन करोड़ पर था अब नौ करोड़ पर है। वो भी तब जबकि झारखंड पहले ही अलग हो चुका है। आजादी के समय बजट हुआ करता था 298 करोड़। अब वो पार कर चुका है एक लाख करोड़। उस समय सबसे सुशासित राज्य था अब फिर से पटरी पर आने की कोशिश कर रहा है। मध्यप्रदेश भी अगर अलग नहीं होता तो वो भी तीर निशाने पर ही चला रहा था। जनता को ना रोटी मिल रही है, ना ही बोटी इस हालत में है कि रोटी कमा सके। किस्मत खोटी कहने से आखिर कब तक काम चलेगा? असली मर्ज को आखिर सरकार और जनता कब समझेगी? अगर किसी देश में एक अदद नौकरी के लिए एक लाख आवेदन आते हों, सफाई के काम के लिए पीएचडी आवेदन करते हों तो क्या इसके बाद भी ये समझ में नहीं आता कि हम किस मुकाम पर हैं? बच्चे पैदा होने चाहिएं इस पर किसे एतराज हो सकता है पर क्या अति जरूरी है? अगर अति है तो इस अति के परिणाम भी तो अति ही होंगे। मति के खराब होने से अति की ये गति जितनी दुर्गति कर रही है उससे ज्यादा झेलने को तैयार रहिए। झेलनी तो पड़ेगी। आज नहीं तो कल। पर वो कल ज्यादा दूर नहीं है। कोई सरकार इतने लोगों को ना तो रोजगार दे सकती और  ना ही खाने को रोटी। जिस दिन ये जनसंख्या विस्फोट का बम फूटेगा उस दिन इस देश के हर गली-हर चौराहे पर वो सब होगा जो पुराने जमाने में होता रहा है। यानि जंगलराज। सोचिए क्या आजादी हमें इसलिए मिली थी...
ना हो कमीज तो पांवों से पेट ढक लेंगे,
 ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफर के लिए। (दुष्यंत कुमार)

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