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COMMENTARY
 

पछताओगे

May 17,2015 01-23-2018 09:35pm

मिथलेश

0 जनाब आदाब- बहुत खराब है शराब। मत पीओ। मानोगे तो हो नहीं। लत पड़ी है ना। कहोगे- आदत पड़ गई है। शाम होते ही बैचेनी हो जाती है। ना मिले तो सिरदर्द हो जाता है। और भी ना जानें क्या- क्या शराबियों के बहाने? इसी लिए तो लिखने वाला ये लाइन लिखकर शराबियों का दुश्मन बन गया-पीने वालों को पीने का बहाना चाहिए? कितनी पीओगे: खुद तो भटक गए हो। मान-सम्मान सब पी चुके हो। सारे घर की खुशियां पी चुके हो। बच्चों की शिक्षा गटक चुके हो। उनके पेट की रोटी पी चुके हो। घर की सुख-शांति पी चुके हो। बीवी या मां के गहने पी चुके हो। खेत पी चुके हो। समाज में सिर उठाकर चलने के हक को पी चुके हो। बेटियों की शादी-विवाह की रकम पी चुके हो। अपनी और घरवालों की सेहत को पी चुके हो। समाज की शांति पी चुके हो। पता नहीं क्या-क्या पी चुके हो? और कितना पीओगे? शराबी पी रहे हैं। पहले शाम को पीते थे। रात को पीते थे। अब तो कोई समय ही नहीं रहा। आंख खुलती है दारू के साथ। कब - कहां- पड़े मिल जाएं: कुत्ते सूंघते मिल जाएं। नाली में कीचड़ के साथ दोस्ती करते मिल जाएं, हर जगह यही तो नैतिकता की दुर्दशा का नजारा है। ये भी नहीं सोचते कि जो पिला रहे हैं यानी जो धंधा कर रहे हैं वो कब के खरबपति बन गए। जो पी रहे हैं वो कबके खाकपति में तब्दील हो चुके हैं। पर पीना है। लीवर का लीवर कबका खत्म हो चुका पर पीनी है।

अफसोस इस बात का है कि पहले लोग आदतन पीते थे। अब तो शौकिया पीने वालों की भी लंबी कतार है। हमारे बच्चे बियर की दुकानों पर इस तरह लाइन लगाए नजर आएंगे जैसे नौकरी मिलने की कतार में हों। कहां जा रहे हैं हम? खुद को शरीर और घर लुटाकर तमाशा देखने का खेल इस लोकतंत्र में कब तक चलेगा? धंधेबाजों की कमाई- सरकार की कमाई पर समाज को क्या मिला? वैसे शराबी कह सकते हैं कि किसी के बाप के पैसे से नहीं पीते। पर ये सवाल तो उनसे है कि सबसे हेय कौन ?

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