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COMMENTARY
 

अनाज पर गाज

May 17,2017 12-17-2017 09:21pm


यह 2003 में हुआ था। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने निजी कंपनियों को सीधे किसानों से गेहूं खरीदने की अनुमति दे दी। कारगिल, ऑस्ट्रेलियन व्हीट बोर्ड, बंज और लुइस ड्रेफस जैसी प्रमुख वैश्विक व्यापारिक कंपनियों ने खरीदी का अभियान चला दिया। नतीजे में जो हुआ वह एक तरह से बंगाल में पड़े 1943 के अकाल के काले दिनों की याद दिलाने लगा। निजी क्षेत्र ने अंतत: गेहूं निर्यात ही किया और लाखों लोग खाद्यान्न से वंचित हो गए।

यह बंगाल जैसे पैमाने पर तो नहीं हुआ लेकिन, सार्वजनिक वितरण की जरूरत के लायक गेहूं नहीं था और तब के खाद्य और कृषि मंत्री शरद पवार (2004 में यूपीए सरकार सत्ता में आने के बाद) के सामने गेहूं आयात करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। 2005-06 के अंत तक भारत ने करीब 80 लाख टन गेहूं आयात किया और वह भी उस कीमत से दोगुनी कीमत पर जो सरकार ने अपने गेहूं उत्पादकों को दी थी। इससे देश में बहुत रोष पैदा हो गया था। इस गलती को पहचान कर यूपीए सरकार ने 2007 में चुपचाप कृषि उपज बाजार समिति (एपीएमसी) अधिनियम का प्रारूप वापस ले लिया, जिसे कई लोग बहुत बड़ा बाजार सुधार मान रहे थे। अब नए कृषि बाजार सुधार जिसे एक देश, एक बाजार का लुभावना नारा दिया गया है और जिसे सरकार लाने की योजना बना रही है, वह भी इससे भिन्न नहीं है। किसानों को बाजारों का व्यापक विकल्प देकर कृषि उपज के व्यापार को मुक्त करने का मतलब निजी बाजार स्थापित करना ही है। इसका नतीजा धीरे-धीरे मौजूदा 7,700 एपीएमसी मंडियों को खत्म करने में ही होगा।

सबसे पहले इस दलील को देखें कि एपीएमसी मंडियों के जरूरत से ज्यादा नियमन और लोकल ट्रेड कार्टेल बनने से किसान को मिलने वाली कीमत सीमित हो जाती है। जो बताया नहीं जा रहा है वह यह है कि एपीएमसी मंडियों में न्यूनतम समर्थन मूल्य का जो भुगतान होता है वही किसान को मिलने वाली निश्चित कीमत होती है। वरना कीमतें ध्वस्त हो जाएंगी और किसान हताशा में चाहे जिस कीमत पर बिक्री करने पर मजबूर हो जाएगा। पंजाब में एपीएमसी मंडियों का अच्छा नेटवर्क है अौर इसलिए कैसी भी हालत हो, गेहूं के किसान को 1,625 रुपए प्रति क्विंटल न्यूनतम समर्थन मूल्य मिल जाता है। बिहार में, जहां 2007 के बाद से एपीएमसी मंडियां नहीं है, किसान को अधिकतम 1,100 या 1,000 रुपए प्रति क्विंटल की कीमत मिलती है। इसलिए बिहार को तत्काल एपीएमसी का ढांचा खड़ा करने की जरूरत है।

इलेक्ट्रॉनिक नेशनल एग्रीकल्चर मार्केट (ई-नाम) में यही अंतर्निहित लक्ष्य है कि किसान को देशभर के बाजार तक पहुंचने में मदद की जाए। अब तक 13 राज्यों की 417 मंंडियां ई-नाम प्लेटफॉर्म पर आ गई हैं। फिर एक बार यह नहीं बताया जा रहा है कि इनाम की कहानी ठीक अब खत्म हो चुकीं ई-चौपाल जैसी है। यदि आप याद करें तो ई-चौपालों को सूचना प्रौद्योगिकी का उपयोग बदलाव के एजेंट के रूप में करने के दावों के आधार पर लाया गया था। अब कोई ई-चौपाल का नाम भी नहीं लेता। ई-चौपाल को काफी धूमधाम से 2000 में लॉन्च किया गया था। मुझे याद है कि किसी लोकप्रिय पत्रिका ने तो कवर स्टोरी भी की थी कि कैसे ई-चौपाल ने भ्रष्ट बिचौलियों को बाहर कर दिया है। यह नहीं बताया गया कि ई-चौपाल चलाने वाली आईटीसी-आईबीडी भी तो बिचौलिया कंपनी ही थी। बाद में पता चला कि आईटीसी-आईबीडी ने सोयाबीन किसानों को जो कीमत दी वह करीब वही थी, जो परम्परागत मंडियां दे रही थीं। फिर 2005 तक ई-चौपाल ग्रामीणों को एफएमसीजी उत्पाद बेचने के वाले मॉल के ग्रामीण नेटवर्क में तब्दील हो गए, जिसे चोपाल सागर कहा गया।

इस तरह ई-चौपाल की चूक में हमारे सामने सबक है, जिसे यूं ही दरकिनार नहीं किया जा सकता। आखिरकार परम्परागत एपीएमसी से संचालित बाजार ही किसान के लिए लाभकारी साबित हुए हैं। मैं यहां एकदम साफ करना चाहता हूं कि यदि एपीएमसी नेटवर्क नहीं होता तो हरित क्रांति भी नहीं होती। इससे इनकार नहीं है कि इतने बरसों में एपीएमसी संचालित मंडिया भ्रष्टाचार का अड्‌डा बन गई हैं। इसलिए चुनौती यह है कि मंडियों को कार्यक्षम व आधुनिक बनाएं और ऐसा मैनेजमेंट सिस्टम विकसित किया जाए, जो राजनीतिक नियंत्रण और संगठित कार्टेल के बाहुबल से मुक्त हो। मैंने पिछले कुछ दशकों में कृषि बाजारों का भीतर और बाहर से काफी अध्ययन किया है। भारत को जो चाहिए वह यह है :
1. एपीएमसी मंडियों के मौजूदा नेटवर्क को तेजी से विस्तार देना। अभी 7,700 एपीएमसी मंडिया हैं, जबकि जरूरत 42 हजार मंडियों की है। पांच किलोमीटर के दायरे में एक मंडी हो। प्रत्येक मंडी को इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म से जोड़ा जाना चाहिए, लेकिन वहां घोषित एमएसपी से नीचे किसी चीज का व्यापार नहीं होना चाहिए। पंजाब की तरह मंडी और गांव को जोड़ने वाले लिंक रोड के नेटवर्क की जरूरत है।

2. मंडी में किसान जो भी उपज लाता है उसे व्यापारी को सरकारी खरीद मूल्य पर खरीदना होगा। ई-नाम मार्केट में मॉडल प्राइज तय करने की कल्पना तत्काल खत्म करनी चाहिए। सच तो यह है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) 24 फसलों के लिए घोषित होता है लेकिन, केवल गेहूं-चावल में ही लागू होता है। एमएसपी ही मंडी में किसी भी उपज के लिए व्यापार का मूल्य होना चाहिए। दूसरे शब्दों में एमएसपी को वैधानिक बनाया जाना चाहिए।

3.किसानों को प्रोत्साहन देने के लिए मंडियों में ग्रेडिंग सिस्टम हो। तीन दशक पहले पंजाब में गेहूं की सफाई व ग्रेडिंग के लिए मशीन लगाई थी जिससे किसान को प्रति क्विंटल 2 रुपए अतिरिक्त मिलते थे।

4. स्पॉट मार्केट की तरह यदि व्यापारी भावी व्यापार के लिए भंडारण कर सकते हैं तो मुझे कोई कारण नजर नहीं आता कि व्यापारी ( या व्यापारियों की सहकारी संस्था) प्याज, चना, आलू, तुअर आदि का भंडारण न करें, जिन्हें वे किसानों से खरीदते हैं। 5. मंडियों को गोदामों के नेटवर्क से जोड़ना होगा। यदि सरकार मोटेतौर पर ढाई लाख पंचायतों के लिए ग्राम सभाएं बना सकती है तो कोई कारण नहीं कि इसी तरह गोदाम न बनाए जा सकें। (ये लेखक के अपने विचार हैं)
कृषि विशेषज्ञ और पर्यावरणविद
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