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COMMENTARY
 

एसेंबली चुनाव मोड में यूपी

March 03,2016 06-20-2018 02:10am

  एसेंबली चुनाव मोड में यूपी
सपा, बसपा व बीजेपी की नाक का सवाल, जदयू, रालोद, जदएस, कांग्रेस, राजद समेत कई छोटे दलों का बनेगा महागठबंधन,सपा के लिए सत्ताजनित नाराजगी तो मायावती के फेवर में उनका कड़क मिजाज, तीसरे नंबर की पार्टी बनकर रह गई है बीजेपी
डीपीएस पंवार
तय मानिए अगला एसेंबली चुनाव किसान के इर्द-गिर्द लड़ा जाएगा, चाहे वो यूपी एसेंबली का हो या फिर उत्तराखंड का। कारण बस यही कि अगली बार इन राज्यों का अन्नदाता जिसकी तरफ होगा-उसकी ही पौबारह। हर दल ने अपने पत्ते सजाने शुरू कर दिए हैं। बात यूपी से ही शुरू करते हैं। पीएम नरेंद्र मोदी बीजेपी की तरफ से बरेली में चुनावी बिगुल बजा चुके हैं।  ध्यान किसान पर-किसान कल्याण रैली के रूप में। यूपी के सीएम अखिलेश यादव ये साल किसान वर्ष के रूप में पहले ही घोषित कर चुके हैं। कांग्रेस पीछे नहीं और ना ही बसपा। यहां तक की जदयू व रालोद मिलकर एक मोरचा तैयार करने की तैयारी में हैं। ऐलान होली के आसपास होगा। 
किसी राज्य की एसेंबली के चुनाव में अगर एक साल से ज्यादा का वक्त बाकी हो लेकिन वो राज्य चुनावी मोड में आ चुका हो तो फिर राजनीतिक दलों के लिए उस चुनाव की कितनी अहमियत होगी, उसका अंदाजा खुद ब खुद लगाया जा सकता है। चुनाव की तपिश पारा बढ़ने के साथ ही तपने लगी है। चुनावी आहट के साथ ही दल-बदल का सिलसिला शुरू होगा। टिकट के दावेदार हाथ-पैर मारने लगे हैं। दीवारें पुतनी शुरू हो गई हैं। एसेंबली का मौजूदा कार्यकाल मई 2017 तक है। आसार हैं कि फरवरी में चुनाव होंगे पर सपा को जानने वाले नेता मान रहे हैं कि मुलायम सिंह यादव नवंबर में चुनाव कराके सबको पटखनी दे सकते हैं लिहाजा कोई मौका नहीं चूकना चाहता। तैयारी पूरी रहें। वैसे ही ये चुनाव तीन दलों की नाक का सवाल है। सपा-बसपा व बीजेपी। मुलायम तो कह चुके हैं कि अगर अगली बार सरकार नहीं बनीं तो फिर कदापि नहीं बनेगी। यही डर बीजेपी का है और बसपा का उससे ज्यादा। मायावती के लिए यही मौका है जब वह अखिलेश सरकार के लिए सत्ता जनित नाराजगी को कैश कर सकती हैं।वरना राज्य में सत्ता में आने के लिए लम्बा इंतजार करना पड़ सकता है।
किसान जरूर एजेंडे पर होंगे पर मुख्य मुद्दा क्या रहेगा ये अहम सवाल है। क्या राममंदिर फिर मुद्दा बनेगा नब्बे के दशक की तरह। तब एक हिस्सा बीजेपी को लाने और दूसरा उसे हटाने पर जोर देता था पर 2007 में सब मुलायम को हटाना है पर जोर रहा, कांग्रेस व बीजेपी रेस में नहीं थे लिहाजा बसपा का सोशल इंजीनियरिंग फार्मूला सफल रहा। 2012 में मायावती को हटाने पर राय थी लिहाजा सपा ने बाजी मारी पर 2017 में वोटर की क्या राय है वो क्या चाहता है ये अब तक किसी को पता नहीं है। इसी वजह से किसानों का रुख हो रहा है? वैसे सपा फिर सत्ता में आती है तो अखिलेश ही सीएमहोंगे। बसपा के जीतने पर मायावती लेकिन ना तो बीजेपी ये तय कर पाई है और ना ही कांग्रेस। पर नजरें केवल बीजेपी पर हैं। मुख्यमंत्री बनने वाले सारे चेहरे या तो केंद्र में बैठे हैं या गवर्नर हो गए। इस चुनाव में चेहरों का खास रोल होगा ये बीजेपी मुखिया अमित शाह को समय पर याद रखना होगा। वरना बिहार जैसी गलती यहां महंगी पड़ेगी। 

क्या है यूपी का हाल?
0 यूपी में चार कोणीय मुकाबला रहने की तस्वीर बन रही है।
0 सपा सत्ता में है, बिना सत्ता वो कम ताकतवर नहीं रहती।
0 बसपा चाहे सत्ता में ना हो पर एक ताकतवर विपक्षी दल।
0 बीजेपी फिलहाल तीसरे नंबर की पार्टी है एसेंबली में ।
0 दो चुनाव में 403 सीटों में से 50 सीटें तक नहीं जीती।
0 इस बार मोदी हवा में चाहती है बेड़ा पार करना।
0 चौथा एंगल कांग्रेस-रालोद-जदयू आदि दलों के जोड़ का।
0 बिहार के मुकाबले यूपी का ये गठजोड़ काफी कमजोर है।
0 वहां राज्य की दो बड़ी ताकतों लालू-नीतीश ने दोस्ती की।
0 यहां जदयू, जदएस, राजद का कोई खास जनाधार नहीं।
सब बीजेपी पर दारोमदार
0 नतीजे इस पर डिपेंड रहेंगे कि बीजेपी कैसा करती है?
0 बीजेपी अगड़ों की पार्टी-क्या पिछड़े साथ में जुड़ेंगे?
0 कुर्मी,लोध,अन्य पिछड़ी जातियां कितना लामबंद होंगी?
0 क्या राम मंदिर लहर जैसा गठजोड़ इन जातियों में होगा?
0अरसे से बीजेपी सरकार बनाने वाली पार्टी नहीं रह गई है।
0 अगड़ों ने सपा-बसपा के साथ सुविधा से हाथ मिला लिया।
0 2007 में बसपा तो 2012 में सपा को मिला था इनका साथ।
0 बीजेपी मुख्य मुकाबले में रही तो सपा-बसपा को घाटा।
0 अफसोस अब तक राज्य अध्यक्ष ही तय नहीं हो पाया।
0 धर्मपाल व स्वतंत्र देव पर घूम रही है शाह की सुईं।
0 ब्राह्मणों को पटाने को महेश व दिनेश शर्मा के नाम।
0 दिल्ली व बिहार की हार के बाद सबसे कठिन परीक्षा का दौर।
0 हार का असर सीधे मोदी पर पड़ेगा, ये दल के नेताओं को पता है। 
0 बिना सीएम के चेहरे के नहीं उतरेगी इस बार बीजेपी। 
0 पार्टी के लिए मुश्किल ये है कि वो किस रणनीति पर जाए।
0 मोदी के नाम पर वोट बढ़ेंगे पर जीत की गारंटी कम।
0 विकास या ध्रुवीकरण अब तक ये तय नहीं कर पाई पार्टी।
0अल्पसंख्यक वोट देंगे नहीं लिहाजा ध्रुवीकरण ही रास्ता है।
0 योगी आदित्यनाथ को आगे लाना चाहता हैऐसा धड़ा।
0 यूपी फतह हो गयी तो फिर देश को क्या जवाब देंगे ?
0 मोदी चाहते हैं कि स्मृति ईरानी को आगे किया जाना सही।
 0   वरुण गांधी समेत तमाम नेता इसके लिए तैयार नहीं हैं।
0 वरुण गांधी खुद दावेदार पर पीछे ज्यादा मजबूत लाबी नहीं है।
0 अकेले राजनाथ सिंह ही दमदार, पर वो केंद्र में मजबूत हैं। 

सपा के लिए सत्ता से पैदा नाराजगी
0 सपा को सत्ता जनित नाराजगी पड़ सकती है ज्यादा महंगी।
0 जो वादे 2012 में किए थे तकरीबन सब हो चुके हैं पूरे पर।
0 वादे पूरे करने से ही सब कुछ नहीं होता, जनधारणा कैसी है?
0 सीएम बहुत अच्छे पर बाकी मंत्रियों के बारे में धारणा बदतर।
0 पर तीन साल तो वो खुद रबर स्टाम्प की तरह काम करते रहे।
0 चुनाव के वक्त वो कैसा दिखते हैं, यह लाख टके का सवाल।
0 सांप्रदायिक हिंसा व कानून व्यवस्था को लेकर सवालों में घिरे।
0 जो उम्मीद उनसे थी उस कसौटी पर खरे नहीं उतरे अखिलेश।
0 उम्मीदें जब परवान चढ़ती हैं तो निराशा ज्यादा हाथ लगती है।
0 हिंसा केबाद जो उन्होंने दिया वो किसी ने नहीं दिया परंतु।
0 लाख टके का सवाल यही कि सपा राज में हिंसाएं हुईं ही क्यों?
0 मुलायम की समय-समय पर नाराजगी सवाल खड़े करेगी।
0अगर मुलायम ही खुश नहीं तो फिर जनता कैसे संतुष्ट होगी?
0 सपा विकास को मुद्दा बनाएगी, किसानों पर ज्यादा ध्यान देगी।
0 विजन डाक्यूमेंट हो रहा है तैयार, अखिलेश ही होंगे चेहरा।
डार्क हार्स रहेगी कांग्रेस
0 कांग्रेस राज्य में चौथे पायदान पर, नहीं सुधरी है हालत।
0 कमजोर संगठन, ढीली जमीन पकड़, गठजोड़ की मजबूरी।
0अकेले लड़ने की तैयारी में खुद राहुल गांधी तक नहीं हैं।
0 माया मानीं तो बसपा के साथ हाथ मिला सकती है कांग्रेस।
0 बशर्ते मायावती कांग्रेस को 70-80सीटें देने पर राजी हो तो।
0 पश्चिम में रालोद से हाथ मिलाने को तैयार पर पूर्व में नहीं।
0 150 सीटों पर खुद लड़ने की चाह रखते हैं सूबे के नेता।
0 सारे पुराने नेताओं को टिकट देने की है रणनीति।
मायावती की तैयारियां
0 15 मार्च को है कांशीराम की जयंती-बसपा दलित कार्ड उछालेगी।
0 कांशीराम को देश रत्न देने का मुद्दा उठाएंगी माया-करेंगी मांग।
0 मिल जाता है तो क्रैडिट लेंगी, ना मिलने पर दलितों को उकसाएंगी।
0 जाट आरक्षण का समर्थन कर पश्चिमी यूपी में सेंध लगाने की तैयारी।
0 इसी दिन वो चुनावी शंखनाद करेंगी, दलितों की एकजुटता पर जोर।
0 सारी पार्टी तैयार, बीएसपी दिखाएगी इस दिन अपनी पूरी ताकत।
0 स्मृति इरानी, जेएनयू व रोहित वेमुला के मामलों को उछालेंगी।
0 अगले चुनाव में मायावती के पुराने राज की खूबी उछालेगी बसपा।
0 जिस गुण से वो सत्ता से बाहर होती हैं वही गुण सत्ता दे जाता है।
0 मायावती का कड़क मिजाज, तुरंत फैसला जनता को पसंद आता है।
0 बसपा अकेली पार्टी जो किसी से गठजोड़ को तैयार नहीं रहती।

बनेगा नया मोरचा
0 नया राष्ट्रीय मोरचा किया जा रहा है अब तैयार।
0 अजित सिंह व नीतीश कुमार में  हो चुकी है सारी बात।
0 नए राष्ट्रीय मोरचे से फिलहाल लालू को रखा जाएगा दूर।
0 यूपी में कांग्रेस अकेली ही चुनाव लड़ने की इच्छुक है।
0 दूसरे राज्यों में कांग्रेस संग सारे मिलकर लड़ेंगे चुनाव।
0 असम एसेंबली चुनाव से पहले हो जाएगा इसका एलान।
0 शरद यादव की पहल पर रालोद, जदयू, जदएस एक साथ।
0 नए मोरचे का नाम व चिन्ह अब तक नहीं हो पाया है तय।
0 जनता दल सेक्यूलर हो सकता है नाम, चक्र चुनाव चिन्ह।
0 15 मार्च से होली के बीच दिल्ली में होगा इसका एलान।
0 मोरचे के निशाने पर किसान, कुर्मी,जाट,पिछड़ी जातियां।
0 अजित सिंह के मुताबिक मुस्लिमों के लिए विकल्प बनेगा।
0पश्चिमी यूपी में रालोद का जनाधार 2014 में बिखरा था।
0नीतीश-लालू ने मोदी के सपनों पर बिहार में पानी फेरा था।
0 इसी वजह से महागठबंधन की जरूरत महसूस की गई।
0 2004 में इसी फार्मूले पर कांग्रेस ने महागठबंधन बनाया था।
0 एनडीए को रोक दिया था, केंद्र में यूपीए की सरकार बनी थी।
0 लालू-नीतीश-अजित-सोनिया-मुलायम मिले तो बीजेपी घाटे में।
0 फिर यही माडल देश में 2019 का चुनाव लड़ सकता है।
0 बिहार व यूपी ही अगली बार तय करेंगे कि केंद्र में कौन ?
0 यहां की 120 सीटें ही निर्णायक, राजग को 104 पर जीत है।
0 वैसे ही नीतीश केंद्र की राजनीति करने के ज्यादा इच्छुक हैं।
0 बिहार में लालू-यूपी में अजित व कांग्रेस राज करें यही प्लान।
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