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COMMENTARY
 

सम्मान का निरादर

October 20,2015 01-23-2018 09:36pm


शशि थरूर
दादरी में मोहम्मद अखलाक और देश में अन्य हत्याओं के विरोध में 40 से ज्यादा साहित्यकारों द्वारा साहित्य अकादमी अवॉर्ड लौटाने से उपजा (माननीय वित्तमंत्री अरुण जेटली के शब्दों में कहें तो)बनावटी विवाद खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। हर दिन नए लेखक विरोध में शामिल हो रहे हैं, जिसे कुछ लोगों ने (संघ परिवार की बदनाम योजना की तर्ज पर) अवॉर्ड वापसी का नाम दिया है। इस अवॉर्ड से सम्मानित करीब 1300 साहित्यकार हैं और इस बात के कोई संकेत नहीं है कि अकादमी का यह रक्तस्राव जल्दी थमने वाला है।
तिरुवनंतपुरम में अकादमिक कार्यक्रम के मौके पर एक रिपोर्टर ने मुझसे इस बारे में सवाल किया तो मैंने पूरी विनम्रता से ध्यान दिलाया कि मुुझे कभी साहित्य अकादमी अवॉर्ड से नवाज़ा नहीं गया, इसलिए इस मामले में मुझे बोलने का कोई अधिकार नहीं है। फिर उसने मुझे लेखक की हैसियत से बोलने पर जोर दिया तो मैंने कहा कि मैं अवॉर्ड लौटाकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्ष में खड़े रहने वाले लेखकों के मूल्यों, उनकी दृढ़ता और साहस की सराहना करता हूं, फिर भी मुझे विरोध के इस तरीके पर खेद है। यह अवॉर्ड स्वतंत्र बौद्धिक, साहित्यिक, रचनात्मक और अकादमिक योग्यता रखने वाली संस्था ने प्रदान किया है और इसे आज के राजनीतिक मुद्‌दों में मिलाना नहीं चाहिए। साहित्य अकादमी चाहे सरकार द्वारा स्थापित किया की गई हो, लेकिन यह कोई राजनीतिक संस्था नहीं है।
राजनीतिक लड़ाई तो लड़ी ही जानी चाहिए, लेकिन उस सम्मान का निरादर क्यों किया जाए, जिसे सरकारी नौकरशाहों के हाथों नहीं, ख्यात लेखकों की जूरी से ग्रहण किया गया है। इस मामले को लेकर बहस के तूफान और टिका-टिप्पणियों के दौरान कई लोगों ने मुझे जलियांवालाबाग हत्याकांड के बाद रवींद्रनाथ टैगोर की प्रतिक्रिया याद दिलाई (ऐसा नहीं कि मुुझे याद दिलाने की जरूरत थी)। गुरुदेव ने विरोध में नाइटहूड की पदवी लौटाते हुए वाइसराय को लिखा था कि इस घोर अपमान की पृष्ठभूमि में वे यह सम्मान अंगिकार करना नहीं चाहते। दोनों मामलों में बहुत बड़ा फर्क है। टैगोर ने नाइटहूड लौटाया था, साहित्य का नोबेल पुरस्कार नहीं। आज के संदर्भ में यह ऐसे होगा कि लेखक पद्‌मश्री तो लौटाए पर साहित्य अकादमी अवॉर्ड नहीं।
जैसाकि मैंने ध्यान दिलाया (और रिपोर्टर ने मेरी टिप्पणी को पूरा उद्‌धृत किया, जिसे कुछ ही लोगों ने पढ़ने की जहमत उठाई) कि ये सम्मान लेखकों की उपलब्धियों पर हमारे समाज की भावांजलि है और न तो उपलब्धियां और न ही ये सम्मान वापस लिए जा सकते हैं। फिर मोदी सरकार अस्थायी दौर है, जिसे चार साल में खत्म करने की उम्मीद मेरे सहयोगी कांग्रेसजनों को है- जबकि साहित्य चिरकालीन है और होना चाहिए। तब क्या होगा जब अधिक स्वीकार्य, उदारवादी सरकार सत्ता में आ जाएगी। क्या तब लेखक अवॉर्ड वापस पाने के लिए अनुरोध करेंगे?
बेशक, मैं मूल्यों पर दृढ़ रहने के संकल्प और असहिष्णुता के जिस वातावरण को मोदी सरकार ने हवा दी है, उसकी निंदा करने के लिए इन लेखकों की सराहना करता हूं। किसी उद्‌देश्य की खातिर ऐसे समय में खड़े होने के लिए साहस चाहिए, जिसमें कई अन्य ने चुप्पी बनाए रखने में ही भलाई समझी। विरोध करने वाले लेखकों की चिंता वाजिब है, क्योंकि लेखन में रचनात्मकता को बढ़ावा देने के लिए बौद्धिक स्वतंत्रता का वातावरण जरूरी है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ऐसी बात है, जिसके लिए बोलना लेखक का नैतिक दायित्व है। यह उतना ही महत्वपूर्ण अधिकार है, जितना हमारी शिराओं में दौड़ रहा खून या हमारी कलम में दौड़ रही स्याही। यदि हाल की घटनाओं पर अकादमी की लचर प्रतिक्रिया इन लेखकों के लिए हताशाजनक थी तो इस मुद्‌दे पर अकादमी का दृष्टिकोण बदलने के लिए दबाव डाला जाना चाहिए पर लेखक के लिए इसका रास्ता लेखन में हैं, अपनी जायज बेचैनी की रचनात्मक अभिव्यक्ति खोजने में है अवॉर्ड लौटाने में नहीं, जिसे प्रदान करने में मोदी सरकार की कोई भूमिका नहीं थी।
इसका मतलब यह कतई नहीं है कि मैं जेटली से सहमत हूं, जिन्होंने लेखकों के रुख को यह कहकर खारिज कर दिया कि यह अन्य तरीकों से राजनीति करने की वैकल्पिक रणनीति है। अपने ब्लॉग में जेटली ने दलील दी है कि लेखक सत्य को विकृत रूप में पेश कर रहे हैं और केंद्र सरकार को एक ऐसे अपराध का दोष दे रहे हैं, जिसके लिए किसी ने सरकार पर ढिलाई (मुझे लगता है उनका आशय मिलीभगत से था) का आरोप नहीं लगाया है। जेटली यह कहकर राजनीतिक वार उलटना चाहते हैं कि, बगावत खड़ी करने के लिए यह जरूरी है कि सत्य को ढंक दिया जाए और ऐसा आभास पैदा किया जाए कि मोदी सरकार ने ये अपराध किए, फिर चाहे वे कांग्रेस और समाजवादी पार्टी शासित राज्यों में हुए हों।

अब यह अजीब किस्म का राजनीतिक कुतर्क है। कानून-व्यवस्था की राज्य सरकार की संवैधानिक जवाबदारी की शरण लेना तो बहुत ही बेतुका है। खासतौर पर तब जब कोई सपने में भी जेटली द्वारा उल्लेखित अपराधों को कांग्रेस या समाजवादी पार्टी के समर्थकों से जोड़ नहीं रहा है। दोष तो साफतौर पर उस माहौल का है, जो भाजपा सरकार ने अपने सात माह के कार्यकाल में निर्मित किया है और पूरे देश में निकृष्टम किस्म की असहिष्णुता को बेकाबू होने दिया गया। इसे गिरिराज सिंह, महेश शर्मा और साध्वी निरंजन ज्योति जैसे भाजपा मंत्रियों व योगी आदित्यनाथ तथा साक्षी महाराज जैसे सासंदों के गैर-जिम्मेदारी भरे बयानों ने और भड़काया। यहां तक कि मोदी के मुखर समर्थक संपादक आर. जगन्नाथन ने भी स्वीकार किया, सार्वजनिक धारणा यूं ही नहीं बन जाती- उनका यथार्थ में कोई आधार होता है। सत्ता से जुड़े इन वरिष्ठ लोगों के किसी भी बयान का प्रधानमंत्री ने कभी खंडन नहीं किया। लंबी चुप्पी के बाद मोदी के इनकार को किसी ने खंडन माना ही नहीं।
यदि मोदी गंभीरता से राष्ट्र से कुछ कहना चाहते थे तो उन्हें यह कहना चाहिए था : प्रधानमंत्री के रूप में मैं ऐसे कृत्यों की निंदा करता हूं, जो हमारी उस सभ्यता के लायक नहीं है, जिस पर हमें इतना गर्व है। भाजपा के नेता के रूप में मैं अपने समर्थकों से कहता हूं कि वे ऐसे बयानों व गतिविधियों से दूर रहें जो इस विविधताभरे समाज में हमसे अलग दृष्टिकोण रखने वालों के खिलाफ असहिष्णुता व हिंसा भड़काए या उसे जायज ठहराए। ऐसा कोई भी जो ऐसे व्यवहार का समर्थन करता है, भड़काता है या अनदेखी करता है उसकी मेरी सरकार में या सत्तारूढ़ दल में कोई जगह नहीं है। मैं उससे तत्काल इस्तीफा मांगूंगा और ऐसी करतूतें करने वालों को कानून के तहत कठोरतम कार्रवाई करूंगा, फिर चाहे वे मेरे दल के लोग ही क्यों न हो। अब यह व्यवहार उस व्यक्ति के योग्य होता, जो पूरे देश का नेतृत्व करना चाहता है। कितनी खेद की बात है कि हम अपने प्रधानमंत्री से ऐसे शब्दों की अपेक्षा नहीं कर सकते। 
विदेशी मामलों की संसद की स्थायी समिति के चेयरमैन व पूर्व केंद्रीय मंत्री
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