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COMMENTARY
 

न्यूट्रिनो बहुत अहम

June 22,2015 04-23-2018 10:53pm


डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम
ख्यात स्विस वैज्ञानिक वोल्फगांग पॉली ने 1930 में कहा था कि न्यूट्रिनो ब्रह्मांड में फोटॉन यानी प्रकाश कणों के बाद दूसरे सबसे ज्यादा पाए जाने वाले कण हैं। हर सेकंड हमारे सामने से 100 खरब न्यूट्रिनों निकल जाते हैं। यही वजह है कि जिस इंडियन न्यूट्रिनो ऑब्जर्वेटरी (आईएनओ) की इतनी चर्चा हो रही है, उसे धरती में 1300 फीट की गहराई पर स्थापित करना होगा ताकि इसे वातावरण के खरबों खरब न्यूट्रिनो से दूर रखा जा सके। अन्यथा जमीन पर लगे न्यूट्रिनो डिटेक्टर को तो न्यूट्रिनो की इतनी संख्या जाम ही कर देगी। न्यूट्रिनो हमेशा रहे हैं, क्योंकि ये 14 अरब साल पुराने हैं और हमारे ब्रह्मांड की आयु भी इतनी ही है। न्यूट्रिनो तीन प्रकार या कहें की तीन फ्लेवर में पाया जाता है। इन्हें इनके द्रव्यमान (मास) के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है। यह तो पता लग गया है कि इनका मास बहुत ही कम होता है, लेकिन यह पता नहीं है कि मास में क्या है और उनका क्रम क्या है। तमिलनाडु के थेनी स्थित बोडी पहाड़ियों पर बनने वाली आईएनओ के सामने यह गुत्थी सुलझाकर न्यूट्रिनो की हमारी समझ पूरी करने की चुनौती होगी।
तीन कारणों से वैज्ञानिक व प्रौद्योगिक प्रगति के लिए न्यूट्रिनो बहुत अहम हैं। एक, वे बहुत बड़ी मात्रा में मौजूद हैं। दो, उनका मास बहुत कम है व इन पर इलेक्ट्रॉन-प्रोटॉन की तरह कोई आवेश यानी चार्ज नहीं है। इस कारण वे गृहों, तारों, चट्‌टानों यहां तक कि मानव शरीर में से भी बिना कोई संबंध बनाए गुजर सकते हैं। तीन, इनसे खगोलशास्त्र, खगोल भौतिकी, संचार और मेडिकल इमेजिंग में नए आयाम खुल सकते हैं। न्यूट्रिनो रिसर्च में भारत अग्रणी रहा है। हमारी ऐसी पहली प्रयोगशाला 1960 के दशक में ही काम करने लगी थी। हमारे भौतिकविदों ने कर्नाटक में मौजूद सोने की खदान में न्यूट्रिनो रिसर्च प्रयोगशाला बनाई थी, जो तब दुनिया की सर्वाधिक गहराई में मौजूद प्रयोगशाला थी। खदान के नाम पर इसे कोलार गोल्ड फील्ड लैब कहा गया। 1965 में इसकी मदद से शोधकर्ताओं ने वातावरण में मौजूद न्यूट्रिनो का पता लगाया था। 1992 में खदान बंद होने के साथ प्रयोगशाला बंद कर दी गई। इसके साथ हमने ब्रह्मांड के सबसे रहस्यमय कण को समझने में हमारे अग्रणी भूमिका गंवा दी। अमेरिका, रूस, फ्रांस, इटली, चीन, जापान और दक्षिण कोरिया पहले ही न्यूट्रिनो विज्ञान पर बहुत तेजी से काम कर रहे हैं। भारत भी न्यूट्रिनो विज्ञान में प्रमुख खिलाड़ी होगा। आईएनओ में लगाया जा रहा 50 हजार टन वजनी मैग्नेटाइज्ड आयरन कैलोरीमीटर दुनिया में सबसे बड़ा है।
वर्ष 2011 में हम दोनों शिकागो से 60 किमी की दूर स्थित फर्मी लैब की न्यूट्रीनो स्टडी लैब गए थे, जिसकी आज बहुत चर्चा है। जब हम इस लैब में गए तो वहां मौजूद हर किसी के चेहरे पर ऐसी लैब होने का गर्व साफ झलक रहा था, जो ब्राह्मांड के कई रहस्य खोल सकती है। आईएनओ कुछ मामलों में फर्मी लैब से भी आगे की प्रयोगशाला होगी। न्यूट्रिनो के बारे में जानकारी न होने से कुछ संदेह भी हैं। क्या न्यूट्रिनो से कैंसर होगा? बिल्कुल नहीं! क्योंकि वे ठोस चीजों से संपर्क ही नहीं करते। इसे ऐसे समझे की यदि न्यूट्रिनो लोहे की रॉड से गुजरे तो एक प्रकाश वर्ष की दूरी (9,460,730,477,580 किमी) चलने के बाद वे लोहे के किसी एक परमाणु के संपर्क में आएंगे। कहने की जरूरत नहीं कि दो मीटर से भी कम के मानव शरीर में न्यूट्रिनो से नुकसान होने की आशंका असंभव-सी है।
लोगों से बात की तो लगा कि वे न्यूट्रिनो को न्यूट्रॉन समझ रहे हैं। उन्हें गलतफहमी थी कि इससे हथियार बनाए जा सकते हैं। जिस खतरनाक न्यूट्रॉन बम की चर्चा होती है, उसका जन्मदाता न्यूट्रॉन है। न्यूट्रान की तुलना में न्यूट्रिनो 17 अरब गुना हल्के हैं। दोनों की कोई तुलना ही नहीं है। यह भी गलतफहमी है कि लैब में बने न्यूट्रिनो प्राकृतिक न्यूट्रिनो से ज्यादा खतरनाक हैं। न्यूट्रिनो तो मूलभूत कणों में से है और इसमें प्राकृतिक व कृत्रिम जैसा कुछ नहीं होता। न्यूट्रिनो की समझ हमें बहुत कुछ दे सकती है। इनसे परमाणु संयंत्रों पर दूर से निगरानी रखी जा सकती है, जिससे परमाणु प्रसार का खतरा टाला जा सकेगा। यूरेनियम-238 से न्यूक्लीयर ट्रांसम्युटेशन के जरिये प्लूटोनियम-239 बनाया जाता है। आतंकी इससे परमाणु बम बना सकते हैं। न्यूट्रिनो डिटेक्टर इसका पता लगाकर ऐसी कोशिश को नाकाम कर देंगे।
न्यूट्रिनो टेक्नोलॉजी से धरती की गहराई में मौजूद खनिज व तेल भंडारों का पता लग सकता है। न्यूट्रिनो जितनी दूरी तक यात्रा करते हैं और जितने पदार्थ में से गुजरते हैं, उनका फ्लेवर उतना ही बदल जाता है। यह खनिज व तेल का पता लगाने के अलावा भूकंप की पूर्व चेतावनी देने में मददगार होगा। यह जियोन्यूट्रिनो का क्षेत्र है, जो 2005 के आस-पास पहली बार पाए गए थे। न्यूट्रिनो निगरानी केंद्रों में न्यूट्रिनो टोमोग्राफी यानी जियोन्यूट्रिनो के विश्लेषण से ऐसा डाटा मिल सकता है, जिसकी मदद से हम भूकंप पैदा करने वाली भूगर्भीय गतिविधियों का पता लगा सकते हैं। न्यूट्रिनो टावर, केबल और उपग्रहों की मदद से अधिक तेजी से डाटा भेज सकते हैं। इसमें ट्रांसमिशन लॉस नहीं होगा, क्योंकि न्यूट्रिनो अपने मार्ग में अन्य परमाणु से संपर्क ही नहीं करते। दूरसंचार व इंटरनेट में इससे नए आयाम खुलेंगे। कुछ वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि दूसरे ग्रहों पर जीवन है तो वहां संपर्क के लिए न्यूट्रिनो सबसे तेज व भरोसेमंद तरीका होगा। आईएनओ में भारत के प्रयासों से ब्रह्मांड का यह गहनतम रहस्य खुल सकता है कि ब्रह्मांड में एंटी-मैटर की तुलना में मैटर ज्यादा क्यों है? डार्क मैटर को समझने में भी मदद मिल सकती है। ब्रह्मांड में 95 फीसदी डार्क मैटर और डार्क एनर्जी है, जो सामान्य मैटर की तुलना में बहुत अधिक है। हालांकि, डार्क मैटर की हमारी समझ बहुत कम है। यह रहस्य खुल गया तो ब्रह्मांड और भौतिकी की हमारी समझ पूरी बदल जाएगी।
न्यूट्रिनो हमें अकल्पनीय टेक्नोलॉजी की ओर ले जा सकते हैं। आईएनअो के साथ भारत न्यूट्रिनो रिसर्च में अपना उचित स्थान हासिल करेगा। मसलन, आईएनओ में न्यूट्रिनो प्रयोगों के लिए विकसित पार्टीकल डिटेक्टर, पॉजिट्रॉन एमिशन टोमोग्राफी (पीईटी) में फोटोन डिटेक्ट करने के लिए भी इस्तेमाल किए जा सकते हैं, जिनका इस्तेमाल कैंसर के ट्यूमर का पता लगाने में किया जाता है। जैसा कि ऊपर बताया गया है न्यूट्रिनो टेक्नोलॉजी से रेडियो एक्टिव पदार्थों की तस्करी पकड़कर कम तीव्रता वाले डर्टी बम आतंकियों के हाथों में पड़ने से रोके जा सकते हैं।
सैकड़ो-हजारों साल पहले होमो सैपियन्स (मानव) ने दो पत्थरों को रगड़कर अाग पैदा की और धरती पर उसका प्रभुत्व हो गया। आज हम उस दहलीज पर खड़े हैं, जहां हम मूलभूत कणों को हमारे हिसाब से दिशा दे सकते हैं। यह ज्ञान हमें ब्रह्मांड पर प्रभुत्व दे सकता है।

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