Face Book Twitter
 
COMMENTARY
 

पानी की तलाश में

June 15,2015 04-23-2018 10:53pm


उपासना चौबे
कुछ दिनों पहले मेरी एक मित्र की मां ने उसे रात में फोन किया था। बात करने के क्रम में उन्होंने उसे बताया कि पड़ोस की किसी बुआ की बिटिया गुम हो गई है। आजकल बच्चों के साथ जैसी घटनाएं घट रही हैं और जैसी खबरें सुनने को मिल रही हैं, उनकी वजह से मेरी सहेली की मां का परेशान होना लाजिमी था। परंतु उस खबर को सुनकर सहेली को थोड़ी खीज व झुंझलाहट महसूस हुई। वे अपने शहर से इतनी दूर बैठकर उस बच्ची के लिए क्या कर सकती हैं सिवाय झूठ-मूठ परेशान होने के! तो इस वक्त यह नकारात्मक खबर सुनाने का क्या मतलब? इस तरह की खबर पर हमारी पीढ़ी के ज्यादातर लोगों की प्रतिक्रिया तकरीबन यही होती है या होगी। वह भी उस स्थिति में जब हम क्रियात्मक रूप से या प्रत्यक्षतः उस समस्या के समाधान में कोई योगदान करने में अक्षम हों। हो सकता है कि मेरी सहेली का यह रवैया व्यावहारिक रूप से सही भी हो, पर क्या मानवीय संवेदनाएं समाधान की तर्ज पर उद्वेलित या शांत होंगी?
किसी के दुख में भावनात्मक सहभागिता का संवेदन, समाधान कर पाने या न कर पाने की क्षमता से कतई संचालित नहीं होता। इसका समीकरण सहज है। यह होगा ही। तो फिर क्या, यह या इस किस्म की व्यावहारिकताएं हमारी सहज मानवीय संवेदनाओं पर प्रश्नचिह्न की तरह नहीं टंग जातीं? किसी के दुख का समाधान हम नहीं कर सकते। इस बहाने के सहारे हम अपने आस-पड़ोस के दुखों के प्रति खुद को उदासीन कैसे रख सकते हैं भला?
मैंने अक्सर अपनी पीढ़ी के लोगों को कहते सुना है, बहुत टेंशन है लाइफ में! या इस सिस्टम ने परेशान कर रखा है। परंतु यदि कभी यह सुनने को मिलता है कि मेरा पड़ोसी परेशान है, इसलिए मुझे अच्छा नहीं लग रहा! तो यकीन कीजिये कि इस प्रकार के वाक्य मन को आश्वस्त करते हैं। आस-पास के कई लोगों को (ज्यादातर पुरानी पीढ़ी के लोगों को) मैंने देखा है कि अक्सर साइकिल रिक्शे पर जाते हुए ऊंचाई आने पर वे यकायक साइकिल रिक्शे से उतर जाते हैं। वजह? साइकिल रिक्शा चलाने वाले पर ज्यादा भार न देने की एहतियात।
पश्चिमी राजस्थान के जिस शहर सिरोही में, मैं आजकल रह रही हूं, वहां लोक में एक मान्यता प्रचलित है कि किसी मरणासन्न व्यक्ति को यदि इस क्षेत्र की आबो हवा में रखा जाय तो, उसकी भी आयु डेढ़-दो वर्ष बढ़ जाती है। वस्तुतः प्रकृति से सामीप्य के कारण यहां के लोक-परिवेश में सकारात्मकता है। पड़ोस में कपड़े इस्त्री करने वाले साहब की छोटी सी दुकान है। दुकान के बाहर खुले मुंह वाला एक मिट्‌टी का बर्तन टंगा रहता है। मेरे पूछने पर उनका जवाब था, यहां आस-पास कहीं भी पानी का खुला स्रोत नहीं है। प्यासे पक्षी आखिर कहां भटकेंगे पानी की तलाश में? उनके लिए ही इसमें पानी रखा जाता है। यह मेरे लिए एक सुखद आश्चर्य की तरह था कि इस शहर के तकरीबन हर छोटी-बड़ी दूकान, मकान एवं वृक्षों पर इस तरह का परिंडा टंगा रहता है। गौरतलब है कि मारवाड़ का यह हिस्सा पानी की बड़ी किल्लत से जूझता है। सिर्फ इतना ही नहीं हर मकान, घर के आगे मवेशियों व कुत्तों को खाना देने के लिए सीमेंट के नन्हें कटोरीनुमा पात्र बने होते हैं। पशु-पक्षी यहां की लोक-संस्कृति का अहम हिस्सा हैं।
मुझे पूर्वांचल में बसा अपना गांव याद आता है। जहां लोग बंदरों के उत्पात से बेतरह परेशान रहते हैं। उन्हें अनवरत गालियां देते हैं पर भीषण गर्मी की लू भरी दुपहरियों में उन्हीं उत्पाती, थके-हारे-प्यासे बंदरों के लिए बाल्टी में पानी भरकर किसी ठंडी छांह में रख देते हैं। बंदरों की प्रकृति ही है उत्पात करना...संवेदनशीलता मानवीय प्रकृति! गांव में हम बच्चे मिट्‌टी के घरों में बने ततैया के नन्हें-नन्हें छत्तों में लकड़ी की सींके चुभोते थे। दादियां-काकियां यह कहते हुए डपटती व समझाती थीं कि किसी का घर नहीं उजाड़ना चाहिए। हमारे लोक-परिवेश में ऐसी मान्यताएं आज भी यथावत हैं। आखिर यह गौरैया, कबूतर, गाय, सांड, कुत्ते, बंदर सभी हमारे पड़ोसी ही तो हैं। बेशक यहां दुख पहले नहीं है परंतु किसी के संभावित कष्ट के प्रति संवेदना व सहानुभूति तो है!
आखिर सकारात्मकता है क्या? क्या सकारात्मकता सिर्फ कुछ बड़ा करने या बड़ा करने के लिए प्रेरित होने का ही भाव है? क्या गर्मी की किसी अंगड़ाई लेती भोर में उठकर, कोयल की कूक के साथ सूरज का उत्सव देखने से अंतर्मन में प्रस्फुटित हुआ सुख का भाव सकारात्मकता नहीं है? कितने दिन हुए आपने मौसमों को आसमान व पेड़-पौधों के रंग-रूप-गंध की मार्फत पहचानना छोड़ दिया है। मौसमों का अर्थ सिर्फ सूती या ऊनी कपड़ों से रह गया है। कभी सुना है आपने इत्मीनान से इधर कम दिखती गौरैया का संगीत या खत्म हुई बरसात के तुरंत बाद (अब तक मिट्‌टी में सोए पड़े मेंढक) निकल आए हल्दी-पीले मेंढक या नवजात बछड़ों-मेमनों का उछल-कूदकर जिंदगी को धीरे-धीरे समझने का ढब। इन पड़ोसियों और इस प्रकृति से प्रेम करके आप खुद के ज्यादा पास आ जाते हैं। खुद को हकीकतन प्रेम करना सीख लेते हैं। यही आपके अंदर सकारात्मकता का संचार करती है।
मेरे ख्याल से सकारात्मकता सर्वप्रथम व्यक्ति को आंतरिक रूप से आनंदित व संवेदनशील मनुष्य बनाती है। दूसरों से प्रेम करना, दूसरों के कष्ट से दुखी होने का जो सच्चा एहसास है, वह क्रमश संवेदनशीलता की ओर बढ़ता है, इसलिए सकारात्मक है। यह संवेदनशीलता व सहिष्णुता ही किसी भी संस्कृति, सभ्यता, समाज का सर्वप्रथम अनिवार्य गुण है, जो सकारात्मक है। इस सकारात्मकता से समाज को नैतिक बल मिलता है और वह समाज अपने उज्ज्वल, ऊंचे आदर्शो को प्राप्त करने के मार्ग पर अग्रसर होता है।
सकारात्मकता का यह भाव व दृष्टिकोण किसी-किसी में स्वतः स्फूर्त ढंग से होता है। कभी-कभी यह अभ्यास से आता है। जिस प्रकार अपने भय से लगातार लड़ते हुए ही हम निडरता का बल प्राप्त करते हैं, ठीक वैसे ही नकारात्मकता से लड़कर ही सकारात्मकता को जीता जा सकता है। एक स्वस्थ समाज को भी लगातार अपने नकारात्मक पहलुओं से लड़ते रहना होता है। अब जरूरत इस बात की है कि हम समय-समय पर स्वयं को झकझोरते रहें। हमारे अंदर दूसरों की तकलीफों के प्रति बेचैनी है, इस बात का निरंतर आश्वासन और भरोसा स्वयं को दिलाते रहें। हां, अब भी हमारे भीतर संवेदनाएं धड़कती हैं। यह संवेदना ही सुख का सकारात्मक चेहरा है।
ज्ञानपीठ नवलेखन पुरस्कार से सम्मानित युवा कथा लेखिका
Total Hits:- 428

add a COMMENT

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Name *

Email Address *

Mobile No.

Comment *

 
 

Advertisement

 
 
 
 
Home | About Us | Contact Us | Advertise With Us
Design & Developed by Web Top Solutions