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COMMENTARY
 

खैरात में जिंदगी

May 17,2015 06-20-2018 02:07am

नैन्सी पंवार

समय होत बलवान-करो तो कल्याण। 0 हर रात जब ठीक 12 का समय होता है तो ईश्वर या जो आप मानते हों वो हम सबके खाते में फिर 24 घंटे का निवेश करता है यानी समय। यानी 1440 मिनट या 86400 सैकंड। अब जो निवेश करता है, वो हिसाब तो मांगेगा। क्या हम कभी इस निवेश का हिसाब देते हैं? बे दिमाग कह सकते हैं कि किसे दें? चलो ना दो पर कम से कम क्या हमें ये तसल्ली रहती है कि हमनें इस समय का बेहतर उपयोग किया? सच में सोचिएगा। कोई सीधे नहीं पूछ रहा है। पर जिसने निवेश किया है वो देख रहा है। तभी ये रीत पड़ी है कि समय सबसे बड़ा बलवान। ऊपर वाले की लाठी में आवाज नहीं होती। अगर समय किसी दुकान पर नहीं मिलता, लौट कर नहीं आ सकता तो फिर हम समय को इस तरह क्यों लुटाते फिरते हैं जैसे ये खैरात में मिला हो? फालतू के लोगों के साथ-फालतू की बातें। जबकि समय और व्यक्ति प्रबंधन ही सबसे बड़ी पढ़ाई और सबसे बड़ा सबक है। कड़वा सच यही है कि जो समय की कद्र नहीं करता - समय उसकी इज्जत नहीं करता। जो इसे खैरात की तरह लुटाते हैं वो जिंदगी भी खैरात की बिताते नजर आते हैं। हां जो समय को पहचानते हैं तो समय उनकी पहचान कायम कराता है। तमाम धन्ना सेठ इसी समय को लुटाने के फेर में भिखारी हो गए। फिर हम सबकी क्या बिसात? या तो खुद सुधरो या फिर समय सुधार देगा। सुधरे तो समय सुधरेगा। नहीं तो फिर?

0सारी उम्र यूं ही काटोगेः किसी भी देश को तीन बातें महान बनाती हैं। एक वहां की कल्चर, दूसरी क्रिएशन और तीसरा कैरेक्टर। जापान को ही देख लो। उससे ज्यादा जुल्म शायद ही किसी देश पर होते आए हों पर वो आज दुनिया का सबसे बेहतरीन देश है। क्योंकि वहां के लोग अपने देश से प्यार करते हैं। असंभव नाम का शब्द उनके कोष में नहीं। नींद से ज्यादा उन्हें काम प्यारा है। 16-18 घंटे। औसत ही जापान में काम करने का 15 घंटे है। अमीर हों या गरीब। समय नहीं देखते। काम-नाम और दाम पर ध्यान लगाते हैं। हमारे यहां ठीक उल्टा। नहाना-खाना-पीना और पूजा करने में ही 24 घंटे के 5-6 घंटे खर्च। अब भारतीय हैं और डाक्टरों की नजीर साथ में है तो सोना भी है कम से कम 8-10 घंटे। गप्पेबाजी और चुगलखोरी का भी कम से कम एक घंटा। ज्यादा काम करते हैं लिहाजा मनोरंजन भी चाहिए उसके भी दो घंटे। काम के लिए बचे केवल 5-6 घंटे। इसमें भी अपना काम छोड़ बाकी के काम में टांग फंसाना। किसी दिन थोड़ा ज्यादा काम करना पड़ा तो फिर घर और दफ्तर को एहसास हो जाएगा। सर्व विदित है कि एक भारतीय अगर औसतन 50 साल जीता है तो वो तीन चौथाई जिंदगी इन्हीं सबमें गुजार देता है। करने के लिए एक चौथाई। इसके बाद क्या ऐसे चेहरों को ये कहने का कोई हक है कि हमें ये नहीं मिला-वो नहीं मिला? जो सफल हैं क्या कभी हमने सोचा कि क्यों हैं? क्या केवल नसीब? काम कुछ नहीं। सही लगे तो मानो वरना समय तो अच्छे-अच्छों को अपना भाव मनवा ही देता है।

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