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COMMENTARY
 

असली धर्मनिरपेक्षता-नकली ठेकेदार

May 18,2015 04-23-2018 10:44pm

देशपालसिंह पंवारःअंधी दौड़- बेढ़ंगी होड़. 0-भारत भले ही दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश हो लेकिन 70 के दशक तक यहां राज करने का हक सिर्फ और सिर्फ कांग्रेस ने ही अपनी बपौती मान रखा था। जब पहली बार देश पर गैर कांग्रेसी सरकार ने हुकूमत की और उसके बाद जनसंघ का सुधरा हुआ रूप बीजेपी आगे बढ़ा तो तमाम कांग्रेसियों और उनकी शह पर ऐसे तमाम चेहरों ने एक राग अलापना शुरू किया-धर्मनिरपेक्षता का। सबने इतनी तेजी के साथ आवाज उठाई कि लगा इस धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में अगर कोई गैर धर्मनिरपेक्ष है तो वो केवल बीजेपी है, संघ है। या फिर दूसरे हिंदूवादी संगठन हैं। यहां तक ही धर्मनिरपेक्षता का दायरा रहता तो भी शायद बात बन जाती लेकिन ये तो हद है कि पूरे बहुसंख्यक तबके को ही धर्मनिरपेक्षता की कसौटी पर खड़ा कर दिया गया।

क्या जमाना आ गया है कि बाकी सब धर्मों के लोग चिल्लाते रहें तो सिर माथे पर और अगर हिंदू अपने धर्म का नाम ले तो वो हिंदुवादी, सांप्रदायिक, फासिस्ट ताकत। पूरे देश में नेताओं की बिरादरी दूसरों को धर्मनिरपेक्षता के पाठ पढ़ा रही है। नेता एक दूजे को पढ़ाएं तो कोई बात नहीं लेकिन लाख टके का सवाल यही है कि क्या धर्मनिरपेक्षता के जरूरत से ज्यादा गान ने इस देश की एकता को दांव पर नहीं लगा दिया है?

0-हिंदुस्तान एक धर्म निरपेक्ष देश है सब जानते हैं। सारी दुनिया भी बेहतर ढंग से जान चुकी है। आजादी के बाद इसका जिस तर्ज पर बिगुल बज रहा है उससे बहरों के अंदर भी रोजाना यह आवाज गूंजती रहती है। अंधों को भी दिखता है कि यह धर्मनिरपेक्ष देश है। इसमें कोई दो राय नहीं कि धर्मनिरपेक्षता सही है। धर्मनिरपेक्ष होना और भी सही है। पर यह भी सच है कि हर चीज एक दायरे में ही अच्छी लगती है और अपना असर कायम रखती है। जरूरत से ज्यादा इसके नकली शोर ने जनता को बोर कर दिया है और इससे देश के संघीय ढांचे का पोर-पोर दुख रहा है। कड़वा सच यही है कि राजनीतिक दलों ने इस शब्द को विवादित बना दिया है। उन्होंने धर्मनिरपेक्षता के मायनों को अपने फायदों के लिए बदलकर रख दिया है। जो इस राह पर नहीं हैं वे दूसरों को सांप्रदायिक बता रहे हैं। जो हैं वे एक कोने में खड़े होकर बंदरबांट तथा दूसरों की खड़ी होती खाट को देख रहे हैं। इन नेताओं की सोच और अपने नसीब को कोस रहे हैं। रह-रहकर सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या वास्तव में ये देश धर्मनिरपेक्ष है? क्या वास्तव में हर शख्स, हर दल सही मायनों में धर्मनिरपेक्षता का मतलब समझता है? उसका पालन करता है? उसके बारे में सोचता है? हकीकत यही है कि ये एक शब्द बोलना आसान है तो नेता राग अलापने में देरी नहीं करते। अमल कठिन है तो वे इसके पास जाने और इसे अपने जेहन में रखने से भी उतना ही परहेज करते हैं। नतीजा धर्मनिरपेक्षता एक गेंद की तरह कभी इधर-कभी उधर उछलती घूम रही है। हमारे देश में धर्मनिरपेक्ष होने से ज्यादा धर्मनिरपेक्ष दिखने का ढोंग चल रहा है। एक फैशन बन गया है। एक झंडे के नीचे आकर सारे सांप्रदायिक चेहरे धर्मनिरपेक्ष बन जाते हैं। फिर आराम से जहां तक चाहते हैं आराम से पैर फैला लेते हैं। कोई बैठने के लिए पैर को जरा सा हाथ लगाता है या गुहार लगाता है तो धर्मनिरपेक्षता पर हमले का हल्ला मच जाता है। अपने ही देश में वो बदनसीब खलनायक नजर आता है। हक का बिगुल बजाने वाले उसके हक को रौंदकर निकल जाते हैं। बिल्कुल अपने नेतागिरी के उसी अंदाज में-हमसे जो टकराएगा-चूर-चूर हो जाएगा। शख्स भले ही चूर-चूर न हों लेकिन इस देश के नेता अपनी करनी से पैदा मस्ती में चूर-चूर हैं। धर्मनिरपेक्षता की असली थीम चूर-चूर है। सांप्रदायिक शब्द से एकता की थीम चूर-चूर है। देश की भलाई के जज्बे से ज्यादातर शख्स दूर-दूर हैं। हैरत की बात है कि यही इस देश के चिराग-ए-नूर-नूर हैं। हिंदुस्तान में सबको अधिकार हैं। मिलने भी चाहिएं । नहीं मिलते हैं तो इस पर आवाज उठनी चाहिए। पर ये ठीक नहीं कि एक अधिकार मांगे तो ठीक और दूसरा अपने हक की बात करे तो सांप्रदायिक। यह कहां का न्याय है कि इसकी आड़ में किसी धर्म-किसी जात, किसी दल- किसी नेता, किसी संगठन-किसी विंग, किसी घर-किसी व्यक्ति को सांप्रदायिक कहकर उसे अछूत बनाने और ठहराने का कथित धर्मनिरपेक्ष ताकतों ने कारखाना खोल लिया है? बिना पैसा खर्च किए मुंह के चंद बोल से इसकी फसल जोतते जा रहे हैं। बगैर ये सोचे कि इससे यह देश आखिर जा किधर रहा है? इस विभेद का खामियाजा आखिर इस देश को झेलना कितना होगा? जब चाहो-जिसे चाहो-जहां चाहो सांप्रदायिक करार दे दिया जाता है।      

धर्मनिरपेक्षता का खुद चोला पहने रहते हैं। ऐसा करने वाली ताकतों के हाथों में सरकार की नकेल है, मीडिया की नकेल है, मिनटों में फलां-फलां सांप्रदायिक है कि गूंज सारी दुनिया में पैदा कर दी जाती है। अगले आदमी को सफाई का मौका तक नहीं मिल पाता। जब तक उसके हलक से बात बाहर आती है वो धर्मनिरपेक्ष से सांप्रदायिक रंग में रंगा नजर आता है। इसके बाद उसके साथ खड़ा हर चेहरा अछूत साबित कर दिया जाता है। जो वास्तव में सांप्रदायिक हैं हम उनकी बात नहीं कर रहे। न उनका साथ देने की बात कर रहे हैं लेकिन जो चल रहा है क्या वो इस देश की सेहत के लिए ठीक है? इन धर्मो के लिए ठीक है? जनता के लिए ठीक है? अगर हां तो फिर कुछ कहने और करने की जरूरत ही नहीं है। अगर ये गलत है तो फिर ये ढर्रा चल क्यों रहा है? इसे चलाने वालों को रोका क्यों नहीं जा रहा है? इस जहर को समेटा क्यों नहीं जा रहा है? जिस तरह इस देश में सांप्रदायिक लोगों की तादाद बढ़ रही है या बढ़ाई जा रही है उससे क्या एक दिन यह सारा देश इसी रंग में रंगा नजर नहीं आएगा? क्या आज जितने लोग इस घेरे में खड़े दिखाई देते हैं या जितना बड़ा ये घेरा दिख रहा है क्या उसके बाद भी यह दावे के साथ कहा जा सकता है कि यह एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है? आखिर इस देश के नेताओं और धर्म के ठेकेदारों तथा धर्मनिरपेक्षता की अपनी तर्ज पर नजीर बदलने वालों को यह क्यों समझ में नहीं आता कि हर दाढ़ी वाला न तो तालिबानी होता है और न आतंकवादी। इसी तरह हर तिलकधारी भी सांप्रदायिक नहीं होता। सफाचट चेहरे अभी यह नहीं बयां कर सकते कि वे धर्मनिरपेक्ष हैं और बाकी सांप्रदायिक। सोच से व्यक्ति धर्मनिरपेक्ष और सांप्रदायिक होता है। यह एक विचारधारा है। जो जज्बात से झलकती है, हमारी करनी से दिखती है लेकिन भरत में उल्टी ही गंगा बह रही है। चेहरों से तय हो रहा है कि फलां धर्मनिरपेक्ष हैं और फलां सांप्रदायिक। मूंछ-दाढ़ी और तिलक से तय हो रहा है कि फलां ये हैं और फलां ये। यह तय करने वाले चेहरे कौन हैं? उनकी सोच कैसी है इसे जानते सब हैं पर उन्हें टोकने, रोकने और इस धारा से मोडऩे की जहमत कोई नहीं उठाना चाहता। बस दो बोल बोलकर, वातावरण में पैदा जहर को और तोड़-मरोड़कर आगे बढ़ा दिया जाता है। नेताओं की नीयत में खोट है-वोट की राजनीति की बढ़ रही चोट से ही धर्मनिरपेक्षता की डूब रही बोट है। यह किस मुकाम पर हम आ गए हैं कि मैं मुसलमानों की बात करूंगा तो आतंकवादी कहलाऊंगा- हिंदुओं की बात करूंगा तो सांप्रदायिक कहलाऊंगा - ईसाइयों की बात करूंगा तो सबको मिरची लगेगी। अगर इन सबकी बात करना गलत है तो फिर क्यों ये शब्द, ये धर्म, ये विचारधारा इस देश में है? क्यों ये देश सब हैं भाई-भाई की अपनी थीम पर पूरी तरह चलता दिखाई नहीं दे रहा है? कुदरत का यही कमाल है-सबका खून एक जैसा लाल है पर मानव की बेढ़ंगी चाल है, बज रहे गाल हैं अलग-अलग सुर ताल हैं और ऐसे में भाई चारा हलाल है। जनता में मलाल है। अजीब राजनीति का मायाजाल है ऐसा बीज बोने पर भी सबके गाल लाल हैं। ये हाल तो तब है जब सुप्रीम कोर्ट ने भी एक मामले में साफ किया था कि धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा को अपनी सहूलियत के लिए लंबा नहीं खींचा जा सकता।

धर्मनिरपेक्ष होने का यह मतलब कतई नहीं है कि धार्मिक विश्वास हदों को लांघ जाए। हमें अधिकारों और व्यक्तिगत आस्थाओं के बीच संतुलन बनाकर चलना होगा। इस नजीर के बाद राजनीति व धर्म के जहर फैलाने वाले वजीर अगर अपनी वही तकरीर जारी रखते हैं तो फिर यही कहा जाएगा कि यहां हर कोई अपनी मर्जी का मालिक है। लोकतंत्र पर पुत रही कालिख है। रोग बढ़ चुका है। इलाज जरूरी है। धर्मनिरपेक्षता की असली थीम को मजबूत करने के लिए बहस होनी चाहिए। नेताओं, धर्म के ठेकेदारों तथा नकली धर्मनिरपेक्षता का ढिंढोरा पीटने वाले बुद्धिजीवियों,कलाकारों को हदों में रखने के लिए फिर से कानून बनना चाहिए, फिजूल बोलने पर रोक लगनी चाहिए। दिलों में दरार पैदा करने वालों पर वार होने चाहिएं ताकि धर्मनिरपेक्षता का असली ताना-बाना कायम रहे। गांधी का यह देश गांधी के ही रास्ते पर चलता दिखाई दे, गोडसे या जिन्ना के रास्ते पर नहीं।

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