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COMMENTARY
 

बढ़ते गरीबःसंकट करीब

May 18,2015 06-20-2018 02:11am

अरुण पंवारःखेती में ही किसान हो गया है खेत। भारत एक ऐसे मुहाने पर खड़ा है जहां से पार पाने के कोई आसार नजर नहीं आते। खाद्य संकट मुहाने पर है। ऐसा नहीं है कि केवल आबादी बढ़ रही हो और पैदावार घट रही हो बल्कि इन दोनों ही मसलों के अलावा इस मोरचे पर केंद्र और राज्य सरकारों की लापरवाही चरम पर है। आसमानी आफत के बावजूद किसान पैदा करते जा रहे हैं, मरते जा रहे हैं और सत्ता में बैठे सभी लोग जिस तरह अनाज बंदोबस्त के नाम पर उसे बर्बाद करते आ रहे हैं वो अलग चिंता का कारण है। ये हालतब है जब मानसून का कोई ठिकाना नहीं है। महंगाई चरम पर है। आबादी का ज्वालामुखी किसी भी वक्त फट सकता है? दरअसल केंद्र सरकार की असली दिक्कत ये है कि जब माहौल अच्छा रहता है तो उसका ढोल पिटती है, मोदी अपना नसीब बताते हैं और जब खराब हो तो बोलती बंद। फिलहाल ढोल हर उस जगह पर अनाज की बदइंतजामी के पिट रहे हैं जहां किसानों ने अपनी जान लगाकर पैदावार की। सब जगह खुले में पड़ा है।राजनेता एक दूजे पर गेंद डालकर पल्ला झाड़ रहे हैं। आखिर किस मुंह से सरकार ऐसे हालात में अपनी सफलता के नगाड़े बजा सकती है?

खेती की जमीन पर महल खड़े होने लगे। सिर पर छत की लालसा में पेट की चिंता को दरकिनार कर दिया गया। देश का खेती का रकबा दस फीसदी घट चुका है। जलवायु परिवर्तन व किसान की कमर टूटने से लगातार उत्पादन घटता जा रहा है। महंगाई बढ़ती जा रही है, आबादी बेलगाम है। मध्यम तबका गरीबी की ओर तेजी से जा रहा है। खाद्यान्न संकट सातवें आसमान पर पहुंचने के खतरे सामने हैं। कारण-हिंदुस्तान में भूखों की संख्या ही 40 करोड़ को पार कर चुकी है। जो हालत है उसमें अगले दस साल में खाद्यान्न की कीमतें दुगनी हो जाएंगी तब क्या हालात होंगे, सोचकर ही डर लगता है। गनीमत है कि ज्यादातर खाद्यान्न की वस्तुएं देश में ही पैदा होती हैं वरना इस देश का हाल भी अब तक उन अफ्रीकी देशों की तरह हो जाता जहां 80 फीसदी से ज्यादा जनता भूखों मर रही है। हर राज्य में किसानों द्वारा आत्महत्या किए जाने और भूख से मरने वालों की बढ़ती तादाद खतरे की घंटी है बशर्ते सरकार को वो सुनाई दे, दिखाई दे।

संयुक्त राष्ट्र संघ हो या फिर ऐसी ही संस्थाएं बरसों पहले ये मानकर स्कीमों पर अमल कर रही थीं कि 2015 तक दुनिया की आबादी चाहे 8 अरब हो जाए पर भूखों की तादाद 50 फीसदी तक घटा दी जाएगी। पहले अफ्रीकी देश इन संगठनों के एजेंडे पर रहते थे पर अब हिंदुस्तान और दूसरे एशियाई देश जहां आबादी लगातार बढ़ती जा रही है और कीमतें उससे कहीं ज्यादा स्पीड से दौड़ रही हैं, वहां भी खाद्यान्न संकट गहरा गए हैं। इन एशियाई देशों में अकाल जैसी स्थिति का डर है। केवल हमारे ही देश में ये माना जा रहा है कि गरीबी रेखा से नीचे जीने वाली सारी आबादी इसकी चपेट में पहले से है पर बढ़ती कीमतों की वजह से उसे एक वक्त की रोटी भी नसीब नहीं होगी। मोदी सरकार की गैरजिम्मेदाराना पालिसी की वजह से देश में हालात बेकाबू होने के खतरे बढ़ते जा रहे हैं। कुपोषण की सबसे ज्यादा मार बच्चों और महिलाओं को झेलनी पड़ रही है। हमारे देश में ऐसी आबादी फिलहाल 15 करोड़ के आसपास मानी जाती है जिन्हें पूरा खाना नहीं मिलता या फिर कम नसीब हो पाता है। वैसे पूरी दुनिया में ऐसे एक अरब से ज्यादा हैं।

हिंदुस्तान में मौसम की मार कम नहीं है। फसलों के उत्पादन में लगातार कमी हो रही है क्योंकि फसलें केवल पेट पालने के काम ही आ पा रही हैं उनसे किसी तरह की कमाई की आस किसान को नहीं है। इसी वजह से किसान धीरे-धीरे जमीन से दूर होता जा रहा है। वैसे इस देश में कभी कोई नीति किसानों के हित के लिए तैयार की ही नहीं गई। फसल वो पैदा करता है। बेचने की बारी आती है तो दाम बाजार तय करता है। जब वो खरीदने जाता है दाम सातवें आसमान पर मिलते हैं। हकीकत यही है कि किसान की पैदा की गई हर चीज सस्ती और उसकी जरूरत की हर चीज महंगी। हालत ये हो गई है कि कोई खेती नहीं करना चाहता। प्रति हेक्टेयर उत्पादन लगातार घटता जा रहा है लागत बढ़ती जा रही है। ऐसे में छोटी जोत के किसान किसी तरह अपने कुनबे का ही पेट पाल पाते हैं। इसके अलावा घर का सपना दिखाने वालों ने जिस तरह खेती की जमीन पर भी घर बनाकर माल कमाना शुरू किया है उससे रकबा लगातार घटता जा रहा है। सरकार का कोई अंकुश नहीं है क्योंकि सारी सरकारी मशीनरी उसी पैसे से लाल हुई घूमती दिखाई देती है। सरकार भी भूमि चाह रही है। अर्थशास्त्री कहते हैं कि अगर पीएम को ये अंदाजा नहीं है कि इस देश में क्या हो रहा है तो फिर क्या किया जा सकता है? अगर जमीन ही नहीं रहेगी तो पैदा कहां करोगे? कहां से इस डेढ़ अरब की आबादी का पेट पालोगे? अगर अफ्रीकी देशों की तरह यहां खाद्यान्न संकट हुआ तो यकीन मानिए ये देश अंदरुनी झगड़ों में ऐसा उलझ जाएगा कि फिर पटरी पर नहीं आएगा। केंद्र सरकार को चाहिए कि वो अब खेती की जमीन पर इमारतों के बनने पर पाबंदी लगाए। बढ़ती आबादी का पेट घटता रकबा और घटता उत्पादन नहीं पाल पाएगा इसके लिए सरकार को कड़े और दूरगामी कदम उठाने होंगे। सरकार को ये सोचना चाहिए कि उन देशों की क्या हालत है जहां हर खाने की चीज आयात करनी पड़ती है?

जलवायु परिवर्तन भी पैदावार घटने का बड़ा कारण माना जा रहा है। सरकार को कीमतों, जमीन व बिजली-पानी जैसी समस्याओं और जनांदोलनों से पार पाना है तो खाद्य व्यवस्था में सुधार लाना ही होगा। खुद सरकारी आंकड़े बताते हैं कि हिंदुस्तानियों को अपनी कमाई के मुकाबले खाद्य सामग्री पर ज्यादा खर्च करना पड़ता है। ब्रितानियों के मुकाबले तकरीबन दो गुना। एक तो कमाई कम ऊपर से महंगाई ज्यादा इससे हिंदुस्तानियों को दो वक्त की रोटी की जद्दोजहद में ही सारा जीवन खपाना पड़ रहा है। सरकार और अफसरों की फौज आए दिन लच्छेदार बातों से समझाने की कोशिश करती है कि सब ठीक है पर हालात कतई ठीक नहीं, वो भी जानते हैं। पर उस तबके पर कोई असर नहीं पडऩे वाला। मरता और पिसता है तो केवल मध्यम तबका और गरीब। यही दोनों गरीबी और महागरीबी की ओर दौड़ लगा रहे हैं। वो भी खाली पेट। विश्व बैंक हिंदुस्तान समेत सब देशों को चेता चुका है कि अगर तुरंत हर स्तर पर कदम नहीं उठाए गए तो स्थिति फिर बस से बाहर हो जाएगी।

दो साल पहले विश्व बैंक की ओर से केंद्र को दी गई रिपोर्ट में कहा गया है कि ग्वाटेमाला में छोटे किसानों की ओर सरकार ने ध्यान नहीं दिया-नतीजा, वहां नौ लाख लोग खाद्य संकट झेल रहे हैं। इसी तरह अजरबैजान में गेंहू का उत्पादन 33 फीसदी गिर गया तो आयात कराना पड़ा। कीमतें 20 फीसदी से ज्यादा बढ़ गईं। पूर्वी अफ्रीका में सूखे की वजह से 80 लाख लोग कुपोषित हैं। मध्यपूर्व व उत्तरी अफ्रीका में कीमतें 38 फीसदी से ज्यादा बढ़ चुकी हैं। हिंदुस्तान को चेताते हुए विश्व बैंक ने कहा है कि यहां तेजी से गरीबों की संख्या बढ़ती जा रही है। हर सातवां आदमी भूखों की जमात में शामिल है। इसके अलावा इसी साल जलवायु परिवर्तन पर जो इंटरनेशनल रिपोर्ट तैयार की गई है उसमें कहा गया है कि 2015 में ही हिंदुस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश, पश्चिमी अफ्रीका, ब्राजील और मैक्सिकों में खाद्यान्न संकट पैदा होगा और अकाल जैसे हालात बनेंगे। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि इन देशों को आने वाले दिनों में खेती के एकदम नए तरीके अपनाने की ज़रुरत हो सकती है।

सीजीआईएआर के वैज्ञानिकों को कहा गया था कि वे ऐसे इलाकों की पहचान करें जहां जलवायु परिवर्तन का खाद्यान्न उत्पादन पर सबसे अधिक असर पडऩे की आशंका है। इसके लिए मौजूदा खाद्यान्न उत्पादन और समस्या से निपटने की क्षमता का अध्ययन किया गया और ये आंकलन किया गया कि जलवायु परिवर्तन की स्थिति में इसमें कैसा असर पड़ सकता है? वैज्ञानिकों ने आने वाले दिनों में आशंकित खाद्यान्न संकट के लिए जिन स्थानों की पहचान की है, उससे बहुत से लोगों को ज़्यादा आश्चर्य नहीं हुआ है। उदाहरण के तौर पर इसमें पश्चिमी अफ्रीका और इंडिया हैंजहां किसान पहले से ही संघर्ष कर रहे हैं। इस शोध में ये भी कहा गया है कि जिन स्थानों पर खाद्यान्न उत्पादन स्थिर बना हुआ है वे आने वाले दिनों में संकट के दायरे में आ सकते हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि ऐसे देशों के दायरे में लातिनी अमेरिकी देश आते हैं जो अपने मूल खाद्यान्न के रूप में बीन्स पैदा करते हैं लेकिन जब जलवायु परिवर्तन की वजह से तापमान बढ़ेगा तो बीन्स की पैदावार को ख़तरा पैदा हो जाएगा। अपने अध्ययन में वैज्ञानिकों ने ये कहा है कि कुछ इलाके जलवायु परिवर्तन के प्रति ज़्यादा संवेदनशील नहीं हैं क्योंकि वे खेती और पशुपालन के लिए ज़्यादा ज़मीन का उपयोग नहीं करते। लेकिन अगर वे फ्यूचर में इस ओर जाने का फैसला करते हैं तो उनके लिए भी संकट बढ़ सकता है। यानि कुल मिलाकर संकट जितना गहरा और गंभीर है हम उतने ही लापरवाह नजर आते हैं।सरकार को भी जमीन चाहिए, जैसे भी हथियाई जाए। आखिर होगा क्या....

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