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COMMENTARY
 

पराए माल से हलाल

May 18,2015 04-23-2018 10:52pm

कुमार वरुणःदेशी सामान बचाएगा हमारा सपना। 0-भारतीय अर्थव्यवस्था का हाल किसी से छिपा नहीं है। रुपए की हालत खस्ता है और डालर चमक रहा है। ऐसा भी नहीं है कि डालर चमकने से अमेरिकी अर्थव्यवस्था चमक रही हो लेकिन हां ये कड़वा सच जरूर है कि भारतीय अर्थव्यवस्था जरूर चौपट हो रही है।46 अरब डालर से ज्यादा तो केवल व्यापार घाटा है। चीन जैसे दुश्मन देशों के सामने सिर झुकाना पड़ रहा है।इसके लिए पुरानी मनमोहन सिंह सरकार की नीतियों की विफलता को जिम्मेदार आसानी से ठहराया जा सकता है। ये काफी हद तक सच भी है लेकिन मोदी सरकार के पास भी ऐसी कोई नीति अब तक तो नजर नहीं आती कि देश इस संकट से अगले चार साल में भी निकल पाएगा। मेक इन इंडिया का नारा देने से भी संकट नहीं जाएगा। उसे लागू करना भी होगा। चीन की तरह। पर सरकार इस दिशा में मौन है। असली मुद्दा गौण है।

वैसे सरकारों की विफलताओं का रोना रोने से कुछ होने वाला नहीं है, हां जनता अगर चाह ले तो अगले चार साल में ये देश इस संकट से निजात जरूर पा सकता है। करना बस केवल इतना है कि जितना संभव हो भारतीय सामान ही खरीदा जाए। उपयोग में लाया जाए। फायदा ये होगा कि हमारी कमाई जिन उत्पादों पर खर्च होगी उसका मुनाफा देशी कंपनियों को ही मिलेगा और वो पैसा देश में ही रहेगा। वरना जब हम विदेशी सामान खरीदते हैं तो हमारी कमाई सारी विदेशी कंपनियों की जेब में चली जाती है।

इसे यूं समझा जा सकता है- कोक की एक बोतल पर कोका कोला कंपनी की लागत आती है केवल एक रुपया और भारतीय ग्राहक से वसूला जाता है 10-15 रुपए तक। दस रुपए से ऊपर की कमाई दुकानदारों की और बाकी नौ रुपए का फायदा डालर में चला जाता है कोका कोला कंपनी के खजाने में। इसमें भी दोहरी मार पड़ती है-दो साल पहले रुपया डालर के मुकाबले तकरीबन 40 पर था, तब जितना हमें देना पड़ता था अब उसके मुकाबले ज्यादा करेंसी का हमें इसमें भी भुगतान करना पड़ता है। यानि डबल चोट। देश बचाने और भारत को सबसे महान बनाने के लिए कम से कम इतना तो भारतवासी कर ही सकते हैं। केवल बोलने से काम चलने वाला नहीं है। कुछ तो करना ही होगा। तो कुछ ऐसी बात जो आप सब जानते तो हैं पर अब करना भी जरूरी है बशर्ते सही लगे तो। भारतीय उत्पाद विश्वस्तरीय हैं बस उन्हें दिल से अपनाने की जरूरत है। अगर हम जीवनसाथी देशी चुनते हैं तो फिर लाइफस्टाइल की सारी चीजें विदेशी क्यों? ऐसा भी नहीं है कि अपनी लाइफ स्टाइल बदलने की किसी भारतीय को जरूरत पड़ेगी बस करना केवल इतना ही होगा कि विदेशी ब्रांड की जगह भारतीय ब्रांड की आदत डालनी होगी।

भारतीय अर्थ व्यवस्था के जानकार कहते हैं कि जिस दिन इस देश में स्वदेशी ब्रांड की ओर ध्यान गया उस दिन ऐसी क्रांति होगी कि भारत सबसे बड़ी महाशक्ति कहलाएगा। सबसे पहले कोल्ड ड्रिंक्स की ही बात की जाए। आजकल युवा पीढ़ी इसकी दीवानी है। वो पीए-जीभर कर पीए लेकिन क्या वो लेमन जूस, ताजा फलों के जूस, लस्सी,दूध, जलजीरा, एनर्जी ड्रिंक, मसाला दूध और नारियल पानी पी सकती है। बनिस्पत इसके की वो कोका कोला , पेप्सी, लिम्का, मिरिंडा और स्प्राइट जैसी विदेशी कंपनियों की बोतलों को गटककर अपना पेट भी खराब करती है और साथ ही इन विदेशी कंपनियों का खजाना भी भरती है। अब तो खुद अमेरिका ने ये मान लिया है कि कोका कोला जैसी कोल्ड ड्रिंक कैंसर फैला रही हैं तो आखिर हम क्यों जेब कटवाकर बीमारी खरीद रहे हैं? कोल्ड ड्रिंक कंपनियों का शुद्ध मुनाफा है एक हजार फीसदी से ज्यादा। अब नहाने के साबुनों की बात कर ली जाए-हम सिंथोल या गोदरेज के दूसरे साबुन से नहाएं, संतूर ,विप्रो, शिकाकाई, मैसूर, संदल, मारगो, नीम, इविटा, मेडिमिक, गंगा, निरमा बाथ या फिर किसी दूसरे अन्य देशी साबुन का इस्तेमाल करें इनमें ऐसी कोई कमी नहीं होती जो इन्हें प्रयोग करने से बदबू आती होगी। हां लक्स, लाइफब्वाय, रेक्सोना, लिरिल, डोव, हमाम, लिसेंसी, कैमी और पामोलिव साबुन जब हम प्रयोग करते हैं तो इसका कमीशन काटकर बाकी हिस्सा विदेशी कंपनियों के खजाने में चला जाता है। पैसा हमारा, शरीर हमारा लेकिन कमाई विदेशी कंपनियों की। मुनाफा है 500 फीसदी से ज्यादा। भारत को क्या मिला -कुछ नहीं। उल्टे रुपए की हालत खस्ता होने से भारतीय खजाने से रुपया ज्यादा जा रहा है। अब टूथपेस्ट की बात करें- हम नीम, बबूल, प्रोमिस, वीको वजरदंती, प्रूडेंट, डाबर उत्पाद या मिसवाक का उपयोग कर सकते हैं। इसके अलावा भी कई देशी दांत साफ करने वाले टूथपेस्ट मौजूद हैं लेकिन कोशिश करें कि कोलगेट, क्लोजअप, पेप्सोडेंट, सिबाका, फोरहंस और मेंटडेंट ना प्रयोग करें। इनके प्रयोग करने से भी बात वही है। इसी तरह टूथब्रुश भी देशी कंपनियों के इस्तेमाल किए जा सकते हैं बनिस्पत कोलगेट, क्लोजअप और ओरल बी के। इसी तरह शेविंग क्रीम की बात है तो क्या गोदरेज और इमामी या कोई भी दूसरी भारतीय क्रीम खराब है जो हम पामोलिव, ओल्ड स्पाइस और गिलेट पर भारतीय मुद्रा और भारतीय अर्थव्यवस्था कुर्बान कर रहे हैं? ब्ले ड भी सुपरमैक्स, टोपाज, लेजर और अशोका आदि यूज हो सकते हैं बनिस्पत सेवन ओ क्लाक, 365 और गिलेट के। विदेशी कंपनियां इनमें 500-1000 फीसदी ज्यादा मुनाफा कमा रही हैं। खजाने को डालर के रुपए में चोट अलग से। जहां तक टेल्कम पाउडर का सवाल है तो भारतीय पाउडर संतूर, गोकुल, सिंथोल, विप्रो बेबी पाउडर या बोरोप्लस खराब नहीं हैं। पता नहीं क्यों हम पोंडस, ओल्ड स्पाइस,जोन्सन बेबी पाउडर, शावर टू शावर पर पैसा खराब कर रहे हैं। शैम्पू में भी कई भारतीय कंपनियां विश्व स्तरीय हैं। निरमा, वेल्वेट आदि को प्रयोग किया जा सकता है। पर हम प्रयोग करते हैं हालो, आल किल्यर, नायले, सनसिल्क, हेडएंड सोल्डर और पेंटीन। नतीजा वही हमारा पैसा और विदेशी कमाई। यही बात विदेशी कारों या हर तरह के विदेशी सामान पर लागू होती है। वैसे तो डिब्बे का दूध ठीक नहीं होता लेकिन बच्चों के लिहाज से अगर इस्तेमाल ही करना है तो इंडियाना, अमूल और अमूल्या कौन बुरे हैं? इसके मुकाबले हम पता नहीं क्यों ज्यादा अनिक, मिलकाना , एवरीडे, मिल्क मेड प्रयोग करते हैं। जहां तक खाने का सवाल है तो हम तंदुरी चिकन या जो मन करे वो घर का बना खाना खा सकते हैं। धाबों पर जाकर खा सकते हैं। होटलों में जा सकते हैं। पर कम से कम ही हम केएफसी, मेकडोनाल्ड , पिज्जा हट और एएंडडब्लयू का इस्तेमाल करें तो हमारी सेहत भले ही ना बचे पर कम से कम इस देश की सेहत जरूर ठीक रहेगी। मोबाइल के बिना नहीं रहा जा सकता। लिहाजा कम से कम कनेक्शन तो एयरटेल, रिलायंस या फिर सबसे बेहतर बीएसएनएल के लिए जा सकते हैं इसके अलावा भी कुछ भारतीय कंपनियां इस रेस में हैं फिर हम क्यों वोडाफोन पर जान दिए फिरते हैं? ये तो कुछ उदाहरण हैं। ऐसा नहीं है कि किसी भी विदेशी उत्पाद का बायकाट करने के लिए हम कह रहे हैं। जहां मजबूरी है वो तो लेना और प्रयोग करना ही पड़ेगा पर जहां काम चल सकता है तो चलाने में क्या दिक्कत है?

दरअसल ये समय की जरूरत है। समय इस देश का खराब चल रहा है। जनता का खराब चल रहा है। अपने देश को बचाने के लिए इतना तो किया ही जा सकता है। माना कि विदेशी कंपनियां यहां रोजगार उपलब्ध करा रही हैं लेकिन ये भी उतना ही सत्य है कि वो एक लगाकर सौ ले जा रही हैं। अगर रुपया मजबूत हो तो भी कोई दिक्कत नहीं लेकिन जब रुपए की हालत इतनी खस्ता है तो हर विदेशी उत्पाद जो हम प्रयोग में लाते हैं वो उल्टे फायदा देने के खजाने को चोट ही लगाता है। इसके अलावा तेल के मामले में भी हर भारतीय को अब अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी। पेट्रोल हो या पानी हमें सब बचाना है। इसी तरह देश के हर शहर में अब बड़े-बड़े स्टोर सब्जियों और दाल-चावल के खुल गए हैं। अगर बड़े कारोबारी ये सब बेचेंगे तो फिर छोटा दुकानदार क्या बेचेगा, कैसे घर चलाएगा? लिहाजा जब देश की चीजों को चुनने की बारी आए तो उस बेचारे की तरफ भी देखिए जो आपके ऊपर ही निर्भर है।

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