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गुलाम मीडिया

May 17,2015 01-23-2018 09:33pm

अरुण पंवार

O विदेशी पूंजी निवेश के नाम पर हिंदुस्तान का ज्यादातर मीडिया विदेशी कर्जदार है। हिस्सेदार हैं। बचे हैं वो या तो उनकी रेंज नहीं या उनमें विदेशी इच्छा के मुताबिक चेंज करने की कुव्वत नहीं। सरकार और मीडिया मालिक लाख दावे करें पर हकीकत यही है कि हिंदुस्तानी मीडिया विदेशी शक्तियों द्वारा संचालित है। ऐसे में आजाद मीडिया की बात करना कहां तक जायज है? पत्रकारिता हित, जनहित, समाज हित,देशहित की सारी बातें विदेशी ताकतों के हाथों की इच्छा में निहित हैं। मीडिया को जब विदेशी पूंजी निवेश की छूट मिली तो अरसे बाद प्राच्य विषयों के जानकार और प्रसिद्ध विद्वान एन एस राजाराम ने इस सिलसिले में एक रिसर्च किया था जिसका सार यही है कि इंडियन मीडिया विदेशी ताकतें चला रही है।

Oमलयालम मनोरमा: जो केरल का प्रमुख समाचार पत्र समूह है और जिसे मैथ्यू परिवार चला रहा है में ज्यादातर निवेश विदेशी है। O बिजनेस स्टेंडर्ड: इस अखबार ने लंदन के फाइनेंसियल टाइम्स से समझौता किया। यानि वो बिजनेस पार्टनर। 0एनडीटीवी: इसे स्पेन स्थित गॉस्पेल्स आॅफ चैरिटी से आर्थिक सहायता मिलती रही है। इसी कारण इस चैनल को पाकिस्तान में दिखाने की छूट तत्कालीन राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने उस समय दी थी जब इंडियन मीडिया पर वहां बैन था। वैसे इस चैनल के मालिक प्रणव राय कम्युनिस्ट पार्टी के पुराने महासचिव प्रकाश करात के रिश्तेदार हैं। साथ ही सिंगापुर बेस फर्म ने 11 लाख डालर का निवेश कियाथा।

oसीएनएनबी-आईबीएन 7: राजदीप सरदेसाई के जमाने में इसे नार्दर्न बैपटिस्ट चर्च शत-प्रतिशत आर्थिक सहायता प्रदान करता रहा था।सारी दुनिया में इसकी शाखाएं हैं तथा इसका मुख्यालय अमेरिका में है। यह चर्च प्रति वर्ष अपने विस्तार के लिए 800 मिलियन डॉलर खर्च करता है। इंडिया में इसके प्रमुख राजदीप सरदेसाई थे। राजदीप पूर्व क्रिकेटर दिलीप सरदेसाई के बेटे हैं। एक जमाने में दिलीप सरदेसाई उस समय विवादों में घिर गए थे जब उन्हें एयरपोर्ट पर गिरफ्तार कर लिया गया था।

0 टाइम्स ग्रुप: द टाइम्स आफ इण्डिया, इकोनोमिक्स टाइम्स, नवभlरत टाइम्स, स्टार डस्ट, फेमिना, विजय टाइम्स, विजय कर्नाटक, टाइम्स नॉऊ (24 घण्टे का समाचार चैनल) इस ग्रुप के प्रमुख पत्र-पत्रिकाएं या चैनल हैं। इस ग्रुप का स्वामित्व बेनेट कोलमैन एण्ड कम्पनी लिमिटेड के पास है। इस ग्रुप को 80 प्रतिशत आर्थिक सहायता वर्ल्ड क्रिश्चियन कांउसिल द्वारा प्राप्त होती है और शेष 20 प्रतिशत एक अंग्रेज तथा एक इतालवी व्यक्ति द्वारा दी जाती है। इतालवी राबटिर्यो मिण्डो श्रीमती सोनिया गाँधी का करीबी रिश्तेदार है। यानि ..।

oस्टार टीवी: एक आस्ट्रेलियाई इसका संचालन करता है, जिसे मेलबार्न स्थित सेन्ट पीटर्स पोन्टीफिकल चर्च द्वारा सहायता प्राप्त होती है। अब ऐसे में कैसे मान लिया जाए कि वो हिंदुस्तान को आगे ले जाने के लिए मुहिम चलाएगा? हां चैनल बड़ा है। पैसा ज्यादा है। बाद में भारतीय साझीदार अलग होकर एबीपी न्यूज के नाम से चैनल लेकर आ गए। यहां भी विदेशी पूंजी निवेश.

0 हिन्दुस्तान टाइम्स: हिंदुस्तान, हिंदुस्तान टाइम्स, मिंट, कादंबिनी और ना जाने क्या-क्या? मूल रूप से ये बिरला ग्रुप का है। जब तक स्वर्गीय के के बिरला की चली तो कहीं से कोई चवन्नी तक उन्होंने नहीं ली पर जैसे ही साम्राज्य उनकी बेटी के पास आया। नया जमाना आया तो विदेशी पैसा इसमें भी लगा। इतना ही नहीं जो टाइम्स ग्रुप हमेशा दुश्मन नंबर एक हुआ करता था उसी टाइम्स ग्रुप से साझेदारी में अब एच टी ग्रुप चल रहा है। इसके अलावा ब्रिटिश फाइनेंस फर्म हैंडरसन ग्लोबल इन्वेस्टर्स ने हिंदुस्तान टाइम्स में निवेश किया था। बाकी भी कई विदेशी निवेशक हैं।

0 द हिन्दू: 128 वर्ष पूर्व आरम्भ हुआ यह समाचार पत्र अरसे तक अपनी लाज बचाए रहा पर अब वो स्विटजरलैंड में बर्न की जोशुआ सोसायटी के हाथ में है। यानि इस अखबार में पूरा पैसा स्विस है। जहां के बैंकों में हिंदुस्तानियों की काली कमाई का ढिंढोरा रोज पिटता रहता है।

0द इण्डियन एक्सप्रेस: यह द इण्डियन एक्सप्रेस और द न्यू इण्डियन एक्सप्रेस नामक दो समूहों में बंट गया है। द न्यू इण्डियन एक्सप्रेस दक्षिण का संस्करण है। द इण्डियन एक्सप्रेस में एक्टस मिनिस्ट्रीज (चर्च का हिस्सा) का काफी बड़ा अंश लगा है। अब चर्च अगर खर्च कर रहा है तो ये सर्च करने की क्या जरूरत नहीं है कि आखिर इसके पीछे मकसद क्या हैं?

0इनाडू: इसका नियंत्रण अब तक रामोजी राव के हाथ में है पर विदेशी निवेश यहां भी हो चुका है। और वो भी सबसे ज्यादा। अमेरिकी ग्रुप ब्लेकस्टोन ने यहां 1238 करोड़ लगाए। 26 फीसदी हिस्सेदारी खरीदी। बिचौलिया रहा कोटक महिंद्रा। इस समूह का सबसे ज्यादा बिकने वाला ये अखबार और दर्जनों चैनल हैं।

0आन्ध्र ज्योति: हैदराबाद के प्रमुख मुस्लिम राजनीतिक दल एमआईएम ने कांग्रेस के पुराने मंत्री के साथ मिलकर इस तेलगू दैनिक को खरीदा था। इसमें भी विदेशी पूंजी निवेश हुआ है। द स्टे्टसमैन: इसका नियंत्रण कम्युनिस्ट पार्टी के हाथ में है।

0कैराली टी.वी: इसका नियंत्रण मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के हाथ में है। मातृभूमि: मुस्लिम लीग और कम्युनिस्ट नेताओं ने इसमें ज्यादा निवेश कर रखा है। कुछ विदेशी पूंजी निवेश भी हुआ है।

0द एशियन एज-: इसका नियंत्रण सऊदी अरब की एक कम्पनी के हाथ में है।

0अमर उजाला: ये घराना 20 वीं सदी तक अपने ही दम पर चलता रहा। 21 वीं सदी में एक ऐसा बनारसी शख्स इस अखबार का संपादक बना जिसने एकता की मिसाल इस घराने को ना केवल तीन टुकड़ों में बांट दिया बल्कि विदेशी पूंजी निवेश के नाम पर ऐसा फंसाया कि सारा घराना ही अलग-अलग हो गया। एक मालिक की मौत के बाद यहां काफी कुछ बदल चुका है। विवाद पीछा नहीं छोड़ रहे हैं.

0डेक्कन क्रानिकल : यहां भी विदेशी पूंजी निवेश हो चुका है। इसके अलावा तमाम चैनल और बड़े कहलाने वाले अखबार भी इसी राह पर विदेशी पूंजी निवेश की चाह पूरी कर चुके हैं। चाहे वो दैनिक भास्कर ग्रुप हो या फिर राजस्थान पत्रिका। माल मिला अखबारों और चैनलों को और खामियाजा या तो पत्रकारिता उठा रही है या फिर इस देश की जनता। सही मसले सामने ही नहीं आ पाते। जिसे विदेशी पूंजी निवेश नहीं मिला या जिसे इस लायक नहीं समझा गया हकीकत यही है कि वहीं पर थोड़ी ज्यादा दिलेरी से पत्रकारिता हो रही है। दरअसल इंडियन मीडिया में दो तरीके का पूंजी निवेश हो रहा है। एक सरकारी पालिसी के तहत और दूसरा चोर दरवाजे से। बर्कशायर हैथवे जैसा मजबूत अमीर ग्रुप हिंदुस्तानी मीडिया में इसी चोर दरवाजे से अंदर आने की फिराक में है। कई घराने उसके आगे-पीछे चक्कर लगा रहे हैं। वैसे हेथवे ग्रुप रियल इस्टेट और दूसरे धंधों में ज्यादा दिलचस्पी दिखा रहा है पर वो जानता है कि सरकार-बाजार और जनता तक असली राह मीडिया के जरिए ही आसान है। जहां तक विदेशी पूंजी निवेश का सवाल है तो दुनिया के सबसे मजबूत 10 देश यहां पूंजी निवेश कर चुके हैं। इनमें सब सेक्टर शामिल हैं। मीडिया भी अछूता नहीं। 98-99 में जहां विदेशी पूंजी निवेश 208 बिलियन डालर था। वहीं अब यह बढ़कर 40 हजार बिलियन डालर को पार कर गया है। आदमी होंठ चबाए तो समझ आता है, आदमी खाल चबाने लगे, ये तो हद है।

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